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July 7, 2022

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निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाला विष्णु पितामह की भांति बलसाली और इच्छा मृत्यु का वरण करने वाला होता है – आचार्य अनिरुद्ध रामानुज दास

धर्म/आस्था:
‌ निर्जला एकादशी की बहुत-बहुत बधाई दिनांक 10 जून 2022 दिन शुक्रवार को निर्जला एकादशी है।
‌ धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे राजन इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नंदन व्यास जी करेंगे क्योंकि यह संपूर्ण शास्त्रों के तत्वज्ञ और वेद वेदांगो के पारंगत विद्वान हैं।
तब वेदव्यास जी कहने लगे भीमसेन ने एक बार यही प्रश्न मुझसे किया था ।दोनों ही पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। यह सुनकर भीमसेन बोले परम बुद्धिमान पितामह आपने उत्तम बात सुनायी। राजा युधिष्ठिर माता कुंती द्रोपदी अर्जुन नकुल और सहदेव एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी कहते हैं कि भीमसेन तुम भी एकादशी को न खाया करो किंतु मैं उन लोगों से यही कह दिया करता हूं कि मुझसे भूख नहीं सही जाएगी। है।
व्यास जी ने कहा यदि तुम स्वर्ग लोक की प्राप्ति चाहते हो और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना । भीम बोले हे पितामह मेरे घर के पेट के अंदर वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है। अतः जब मैं बहुत अधिक खाता हूं तभी यह शांत होती है इसलिए महामुनि मैं वर्ष भर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूं। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो जिसके कारण कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।
व्यास जी ने कहा भीम जेष्ठ मास में सूर्य राशि पर हो या मिथुन राशि पर शुक्ल पक्ष में जो एकादशी हो उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो ,केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुंह में जल डाल सकते हो। उसको छोड़कर और किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में ना डालें अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। वर्ष में जितनी भी एकादशियां होती हैं उन सब का फल निर्जला एकादशी सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है।इसमें तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिए। शंख चक्र गदा धारण करने वाले भगवान श्री केशव की कृपा से निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है। तुम भी सब पापों की शांति के लिए यज्ञ के साथ उपवास और श्री हरि का भजन करो स्त्री हो या पुरुष यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब एकादशी के प्रभाव से भस्म हो जाता है।
जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है वह पुण्य का भागी होता है उसे एक एक पहर में कोटि-कोटि स्वर्ण मुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है वह पाप भोजन करता है ।इस लोक में वह चांडाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है। जो जेष्ठ के शुक्ल पक्ष में एकादशी उपवास करके दान देंगे वह परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है। वह ब्रह्म हत्यारे शराबी चोर तथा गुरु द्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।
हे कुंती नंदन निर्जला एकादशी के दिन विद्वान स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष ध्यान और कर्तव्य बनता है उसे सुनो उस दिन जल में सयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और मीठे जल का दान करना चाहिए। पर्याप्त दक्षिणा और भांति-भांति के साधनों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को संतुष्ट करना चाहिए। जिन्होंने दान में प्रवृत्त हो श्री हरि की पूजा एवं रात्रि में जागरण करते हुए इस एकात्म निर्जला एकादशी का व्रत किया है उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुंचा दिया है।
निर्जला एकादशी के दिन अन्न वस्त्र रुई जल सहित सुंदर आसन कमंडल तथा छाता दान करना चाहिए। यह श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्ग लोक में जाता है।
भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी क्या करूंगा ऐसा संकल्प लेना चाहिए द्वादशी को देवदेवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गंध पुष्प और सुंदर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल का भरा हुआ घड़ा लेकर के दान करने से परम गति की प्राप्त होती है ।भीमसेन जेष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े का दान करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुंचकर आनंद का अनुभव करता है ।तत्पश्चात द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करें। जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पाप नाशिनी एकादशी का व्रत करता है वह सब पापों से मुक्त ब्रह्म लोक में पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरंभ कर दिया तब से यह लोक में पांडव द्वादशी के नाम से विख्यात हुई ।
ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास रामानुज आश्रम संत रामानुज मार्ग शिव जी पुरम प्रतापगढ़
कृपा पात्र श्री श्री 1008 स्वामी श्री इंदिरा रमणाचार्य पीठाधीश्वर श्री जीयर स्वामी मठ एवं पीठाधीश्वर रामानुज कोट नैमिषारण्य

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