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July 7, 2022

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उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में हेराफेरी कर नियम विरुद्ध लिया प्रोन्नति: अपर आयुक्त लाइसेंस हरिश्चंद बने नटवर लाल :

लखनऊ। अपर आबकारी आयुक्त लाइसेंस हरिश्चंद श्रीवास्तव पर हाईकोर्ट के आदेश में हेराफेरी कर नियम विरुद्ध प्रोन्नति प्राप्त करने का गंभीर आरोप लगा है।

सूत्रों के अनुसार 20/02/2006 के प्रमुख सचिव अनिल गुप्ता की अध्यक्षता में हुई डीपीसी में प्रोन्नत किये गए 1994 बैच के निरीक्षकों जिन्हें सहायक आबकारी आयुक्त पद पर प्रोन्नति दी गयी थी। इस डीपीसी में हरीश चंद्र श्रीवास्तव को जोकि 1994 बैच का टॉपर था किंतु भ्रष्टाचार संबंधी प्रकरण लंबित रहने के कारण पदोन्नति नहीं दी गई । जब हरीश चंद श्रीवास्तव को इस डीपीसी में पदोन्नति नहीं मिली तो उसने एक साजिश रची। सबसे पहले अपना एसीआर सही करवाया और उसके बाद वर्ष 2007 में जुगाड़ करके एक और डीपीसी कराई। इस डीपीसी में हरीश चंद श्रीवास्तव समेत 16 लोग पदोन्नति पाने में सफल हुए। इसी बीच 1992 बैच के इंस्पेक्टर जिनका प्रकरण हाईकोर्ट में पहले से ही चल रहा था इस मामले के खिलाफ एक और याचिका हाईकोर्ट में दाखिल कर दी जिस पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने वर्ष 2007 में हुई डीपीसी को नियम विरुद्ध बताते हुए पदोन्नति पाने वाले निरीक्षकों के पदभार ग्रहण करने पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट के इस फैसले से एक बार फिर हरिश्चंद्र को मायूसी हुई लेकिन उसने नई साजिश रची और 1992 बैच का प्रकरण जिसे हाईकोर्ट ने 3 महीने में निस्तारित करने का आदेश किया था उसे ढाई साल से ज्यादा समय तक तब तक लटकाए रखा और वर्ष 2010 में इसका निपटारा तब कराया जब वह स्वयं पदोन्नत की पात्रता में आ गया।

2006 की डीपीसी में प्रोन्नत निरीक्षक 2010 की डीपीसी के समकक्ष कैसे :

इस बीच उच्च न्यायालय ने 2007 में संदर्भित प्रकरण में एक विस्तृत आदेश पारित करते हुए वरिष्ठता सूची बनाने का आदेश दिया इस आदेश का अपने निजी हित में दुरुपयोग करते हुए हरीश चंद्र श्रीवास्तव ने वर्ष 2006 में प्रमुख सचिव अनिल गुप्ता की अध्यक्षता में हुई डीपीसी में पदोन्नति प्राप्त कर सहायक आबकारी आयुक्त बनने वाले सभी निरीक्षकों को जो हरिश्चंद्र श्रीवास्तव जिन्हें वर्ष 2010 में हुई डीपीसी में सहायक आबकारी पद पर प्रोन्नति प्राप्त हुई । वरिष्ठता सूची में हेराफेरी करते हुए बिना जिला आबकारी अधिकारी के रूप में प्रोबेशन पीरियड बिताये बिना आयुक्त आबकारी लाइसेंस बन बैठे जबकि हरीश चंद्र श्रीवास्तव से 4 वर्ष पहले प्रोन्नति पाने वाले निरीक्षक हरिशचंद के समकक्ष रह गए।

यह भी पता चला है कि वर्ष 2007 में डीपीसी बनाने में करोड़ों रुपए की उगाही हुई थी।

सूत्रों का कहना है कि यदि 2006 से 2010 तक जो भी डीपीसी हुई है यदि उसकी उच्च स्तरीय जांच की जाए तो बहुत बड़ा घोटाला सामने आ सकता है और बताने की जरूरत नहीं कि हरीश चंद्र श्रीवास्तव इस घोटाले का मास्टरमाइंड है जो फिलहाल नियम विरुद्ध प्रमोशन पाकर आबकारी आयुक्त लाइसेंस के पद पर तैनात है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अंतरिम आदेश में 1994 बैच के इंस्पेक्टर जिन्हें वर्ष 2006 में अनिल गुप्ता प्रमुख सचिव आबकारी के नेतृत्व में हुई डीपीसी में पदोन्नति प्राप्त हुई थी संदर्भित प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी जिस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने विभाग को आदेश दिया कि dtc में पदोन्नति पाने वाले इंस्पेक्टर को रिवर्ट ना किया जाए लेकिन 2010 में हुई विभागीय प्रोन्नति समिति में भारी अनियमितता बरते हुए 2006 में प्रोन्नति पाने वाले निरीक्षकों की वरिष्ठता सूची 2006 सेना निर्धारित करते हुए 2010 की डीपीसी के अनुसार निर्धारित की गई।

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