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बिना किसी युद्ध के ही तबाह हो गया श्रीलंका: निजीकरण के बाद आई कंगाली: गरीबी भुखमरी और कुपोषण के चलते देश छोड़कर भाग रहे लोग

कोलंबो। यूक्रेन भले ही रूस की बमबारी से तबाह हुआ हो लेकिन भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में बिना किसी युद्ध के ही तबाही का मंजर देखने को मिल रहा है। देश का पूरी तरह निजी करण कर दिया गया जिसका दुष्परिणाम अब सामने आ रहा है। निजी कंपनियां मुनाफाखोरी में जुट गई है। पेट्रोल जहां ढाई सौ के पार है वही गैस किसी भी दम पर नहीं मिल पा रही है। श्रीलंका में जबरदस्त खाद्यान्न संकट देखने को मिल रहा है। जमाखोरी चरम पर पहुंच गई है। लोगों की क्रय शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई है। उत्पादन ठप हो गया है। औद्योगिक इकाइयों के पास कच्चा माल खरीदने के लिए पैसा नहीं है। विनिर्माण क्षेत्र पूरी तरह ठप है। श्रीलंका की मुद्रा की कीमत रसातल में पहुंच चुकी है। देश के ज्यादातर जमीनों पर चीन का कब्जा दखल है। चीनी कंपनियां श्रीलंका की तबाही का कारण मानी जा रही है। इस समय जबकि श्रीलंका आर्थिक रूप से बर्बाद हो गया है। चीनी कंपनियां मुनाफाखोरी में जुटी हुई है। देश के विनिर्माण ढांचे और सरकारी कंपनियों पर चीनी एकाधिकार के चलते अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं लंका को और अधिक ऋण देने से बच रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की ऋण अदायगी कर पाने में असमर्थ लंका को दिवालिया घोषित होने का खतरा पैदा हो गया है।

भुखमरी और गरीबी से बचने के लिए देश छोड़ रहे लोग

श्रीलंका की आर्थिक तबाही को देखते हुए वहां पर निम्न आय वाले लोग पड़ोसी देश भारत की शरण ले रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार अब तक लगभग 10,000 से ज्यादा शरणार्थी भारत के दक्षिणी राज्यों की सीमा पर दिखाई दिए हैं

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