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June 27, 2022

अवधभूमि

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प्रधानमंत्री ने कुंभ में जिनके पैर धोए थे उन्हें नौकरी के लाले पड़ गए हैं: सफाई कर्मचारी काफी निराश है और नारकीय जीवन जीने को मजबूर है

वाराणसी। प्रधानमंत्री वाराणसी के अपने दौरे में कुछ सफाई कर्मियों के साथ भोजन करते दिखाई दे रहे हैं और यह तस्वीर सभी मीडिया में सुर्खियां बनी हुई है लेकिन एक और तस्वीर और से जुड़े लोगों का दर्द उभर आया है।

बात 25 फरवरी 2019 के करते हैं जब प्रधानमंत्री कुंभ में थे और उन्होंने यहां पर आवाज स्वच्छता कर्मियों के पैर धोए थे। उस समय भी प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। उनके इस कदम का लाभ भी हुआ था और सभी सफाई कर्मियों और उनके परिवार ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जमकर मतदान किया था लेकिन आज वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। प्रयागराज के संविदा सफाई कर्मियों की उम्मीद थी उन्हें नियमित कर दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ ज्यादातर सफाई कर्मियों के संविदा समाप्त हो गई। बहुत से सफाई कर्मियों को महीनों से उनका मानदेय नहीं मिला।

2019 में हुए कुंभ की मजदूरी भी नहीं मिली

बहुत से सफाई कर्मियों का दर्द छलक पड़ता है। वह कहते हैं कि साहब यह सब दिखावा है। बातचीत के दौरानबातचीत के दौरान इन सफाईकर्मियों के बीच एक जिस बात को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश था वह यह कि कड़ी मेहनत करने के बावजूद उनके पैसों का भुगतान समय पर नहीं किया जाता इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 2019 में कुंभ मेले में किए काम का पैसा अभी तक इन सफाई कर्मियों के बैंक खाते तक नहीं पहुंचा है और जिनका पहुंचा भी है वो भी पूरा नहीं । मेले में काम करने आए सफाई कर्मी सरवन को बेहद गुस्से में देखा, कारण पूछने पर बताया कि जब हमारी मेहनत और काम में कोई कमी नहीं रहती तो हमको हमारा पैसा समय पर क्यों नहीं दिया जाता है। वे कहते हैं कुंभ मेले में तो प्रधानमंत्री जी ने खुद आकर हमारे लोगों के पैर धोए थे और सम्मानित भी किया था, बावजूद इसके हालात आज और भी बदत्तर है।

शीतल बोली नौकरी पक्की करने की बात कही थी लेकिन अब तो मजदूरी के भी लाले हैं

अब बारी थी उन सफाई कर्मियों में से किसी एक से भी मिलने की जिनके पैर कुंभ मेले में प्रधानमंत्री ने धोए थे और जिन्हें पुरस्कृत किया था, तो पता चला कि शीतल देवी उनमें से एक हैं। मालूम पड़ा कि शीतल देवी इलाहाबाद के संजय कलोनी में रहती हैं। उनके घर जाने पर उनसे मुलाक़ात हो गई। वे भी इन दिनों माघ मेले में ही ड्यूटी कर रही हैं। सैकड़ों सफाई कर्मियों के बीच जिन पांच लोगों को प्रधानमंत्री ने सम्मानित किया था, शीतल देवी उन्हीं में से एक हैं। पहले तो वे खुलकर बात करने से झिझक रही थीं, उनका भयग्रस्त होना स्वाभाविक था। जब पूरे देश में आपको चर्चा का विषय बना दिया जाए और देश के प्रधानमंत्री स्वयं आपको सम्मानित करें तो किसी के लिए भी सिस्टम के ख़िलाफ़ बोलना महंगा पड़ सकता है, लेकिन परिवार वालों के समझाने के बाद शीतल देवी बोलने को तैयार हो गईं।

कहती हैं हमको केवल इस नज़रिए से देखा जाता है कि हमको प्रधानमंत्री के हाथों पुरस्कार मिला, लेकिन हालात से लड़ाई तो हम आज भी लड़ रहे हैं। हमारे लिए तो कुछ भी नहीं बदला। उनके मुताबिक जब उन्हें सम्मानित किया जाना था तो पहले ही कह दिया गया था कि कोई भी प्रधानमंत्री जी से बात नहीं करेगा। अपना पुरस्कार लेकर चले जाना है, लेकिन उन्होंने बात करने की हिम्मत की और अपने हालात को बयां करते हुए एक स्थाई नौकरी की बात कही। तब प्रधानमंत्री ने उनकी सुनी भी और उनके हालात सुधारने का आश्वासन भी दिया था। वे कहती हैं प्रधानमंत्री जी के आश्वासन के बाद उनका परिवार और वे बेहद खुश थे लेकिन हुआ तो कुछ भी नहीं आज भी वे एक अस्थाई नौकरी पर ही गुजर-बसर कर रहे हैं। नौकरी अस्थाई होने के कारण कब निकाल दिया जाए इसका डर हमेशा रहता है।

सफाई कर्मचारी संघ के अध्यक्ष ने कहा कुंभ में 5 सफाई कर्मियों की ठंड से मौत हुई सरकार ने मुआवजा तक नहीं दिया

इलाहाबाद सफाई मजदूर एकता मंच के अध्यक्ष राम सिया जी कहते हैं “ऐसे बड़े-बड़े आयोजनों में सफाई कर्मचारियों का उत्पीड़न भी खूब होता है। नाले किनारे उन्हें जगह दे दी जाती है, न ठंड से बचाने का कोई उपाय किया जाता है न महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के बारे में सोचा जाता है। यहां तक कि उनका मेहनताना भी उन्हें समय से नहीं मिल पाता है।” वे बताते हैं कि पिछले कुंभ मेले में पांच सफाई कर्मियों की मौत ठंड से हो गई थी जिनके मुआवजे के लिए मंच ने खूब लड़ाई लड़ी लेकिन आज तक उन्हें मुआवजा तक नहीं मिल पाया। राम सिया जी कहते हैं “केवल सफाई कर्मियों के पैर धोने से हालात नहीं सुधरेंगे, जिस कुंभ मेले में आकर प्रधानमंत्री जी ने सफाईकर्मियों के पैर धोकर देशभर में वाह-वाही लूटी थी, उसी कुंभ मेले में एक साधू द्वारा मध्यप्रदेश के छतरपुर से आए
सफाईकर्मी आशादीन का हाथ तोड़ दिया गया था और वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि आशादीन द्वारा साधू की बाल्टी छू ली गई थी।” राम सिया जी कहते हैं ऐसा उत्पीड़न भी इन सफाई कर्मियों के साथ इन मेलों में होता है जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं, लेकिन फिर भी पेट की भूख उन्हें ऐसे आयोजनों तक खींच लाती है। जबकि अभी कुंभ मेले में ड्यूटी करने का पैसा अभी तक कई सफाई कर्मचारियों को नहीं मिल पाया है और इस मेले का भी पैसा कब मिले कुछ भी कहना संभव नहीं ।

मेलों की इस चकाचौंध के पीछे एक वर्ग की ऐसी अंतहीन वेदना भी छुपी है जिसका जिक्र किसी के लिए महत्व नहींरखता ।

प्रधानमंत्री भले ही अपने साथ गरीबों को भोजन पर बुलाएं लेकिन अब गरीब और वंचित तबके के लोगों पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता।