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May 27, 2022

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योगी ने क्यों खेला जाति का कार्ड: यह संयोग है या प्रयोग

लखनऊ। हिंदुस्तान अखबार के साथ एक इंटरव्यू में खुलकर क्षत्रिय होने पर गर्व का इजहार किया जबकि नाथ संप्रदाय में किसी भी महात्मा या महंत हो अपनी जाति और पारिवारिक पृष्ठभूमि बताने पर मनाही है बावजूद इसके सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक कारणों से अपनी जाति बताइए और उस पर गर्व का भी एलान किया।

हरिशंकर तिवारी से योगी की है खुली अदावत:

पूर्वांचल के गोरखपुर महाराजगंज देवरिया बस्ती अंबेडकर नगर कुशीनगर आदि कई जिलों में इस बार योगी को खुली चुनौती मिल रही है। गोरखपुर सदर में उपेंद्र शुक्ला की पत्नी के चुनाव लड़ने से ब्राह्मणों की हमदर्दी समाजवादी पार्टी की और दिखाई दे रही है जिससे मठ को पहली बार सीधे चुनौती मिल रही।

योगी को लगता है कि ब्राह्मण उनके चेहरे को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं और गोरखपुर तथा आसपास के जिलों में उनके प्रभाव को क्षीण कर रहे हैं। उन्होंने भी अपने संन्यास और वेशभूषा की परवाह न करते हुए क्षत्रिय समाज को खुला संदेश दिया है कि अब वह इस समाज के एकमात्र नेता हैं। योगी चाहते हैं कि क्षत्रिय समाज उनके पीछे एकजुट होकर खड़ा हो जाए।

यह संयोग नहीं बल्कि प्रयोग है

पिछले कुछ समय से यूपी चुनाव की बागडोर पूरी तरह अमित शाह के हाथों में है और टिकट वितरण में अमित शाह ने जिस तरह से ओबीसी और दलितों की राजनीति की है उससे योगी को यह आशंका हो गई है कि आगे चलकर भाजपा के जीतने की स्थिति में संख्या बल के आधार पर कहीं उन्हें किनारे ना कर दिया जाए इसलिए उन्होंने कम से कम क्षत्रिय समाज को अपने पीछे एकजुट करने की रणनीति के तहत यह संदेश दिया है।

ब्राह्मण भी प्रतिक्रिया में एकजुट हो सकते हैं

योगी पर पहले भी जातिवाद का आरोप लगता रहा है लेकिन उनके इस ताजा इंटरव्यू के बाद आरोपों की पुष्टि हो गई है। ऐसे ब्राह्मण जो अपने मठ का सन्यासी समझते थे और कट्टर समर्थक थे वह उनके इस ताजा बयान के बाद अपनी धारणा में बदलाव ला सकते हैं हो सकता है कि अब वह नए विकल्पों पर विचार करें।

दलितों और पिछड़ों पर भी हो सकता है नकारात्मक प्रभाव

योगी आदित्यनाथ ने क्षत्रिय होने पर जिस तरह से गर्व की बात कही उससे भाजपा समर्थक दलितों और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में भी नकारात्मक प्रतिक्रिया हो सकती है क्योंकि अभी तक यह सभी योगी को सन्यासी समझकर उनके समर्थक थे।

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