
लखनऊ। कानपुर देहात के रनिया इंडस्ट्रियल क्षेत्र में आरती डिस्टलरी की नीव ही अरबो रुपए के घोटाले से शुरू हुई है। भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि पूर्व प्रमुख सचिव संजय भूस रेड्डी के करीबी तिलक राज शर्मा ने डिस्टलरी के इंस्टॉलेशन के समय ही इसकी उत्पादन क्षमता 487 kl बल्क लीटर रही है तत्कालीन कमिश्नर प्राविधिक अधिकारी सभाजीत वर्मा की मिली भगत से डिस्टलरी की वास्तविक क्षमता से 30% कम पर पासिंग करवा लिया इसके बदले अधिकारियों को मोटी रकम जरूर मिली है। इस खेल से आबकारी विभाग को जहां कम से कम ₹240 करोड़ से अधिक लाइसेंस फीस का नुकसान हुआ वहीं यदि यही डिस्टलरी पूरी क्षमता से चलती तो करीब 600 करोड रुपए आबकारी राजस्व भी अधिक मिल सकता था।
आईए जानते हैं किस अधिकारी की इस घोटाले में क्या भूमिका रही है:
पूर्व प्राविधिक अधिकारी सभाजीत वर्मा और वर्तमान प्रभारी प्राविधिक अधिकारी संदीप मोडवेल की भूमिका:
इस घोटाले में पूर्व प्राविधिक अधिकारी सामाजिक वर्मा की सबसे बड़ी भूमिका रही है। सभाजीत वर्मा यह जानते हुए कि डिस्टलरी के उत्पादन क्षमता 487 किलो बल्क लीटर से ज्यादा है फिर भी कंपनी के वास्तविक उत्पादन क्षमता से 30% कम पर उत्पादन क्षमता को स्वीकृति दे दी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस खेल में तत्कालीन कमिश्नर और प्रमुख सचिव भी शामिल रहे।
तत्कालीन डिप्टी लाइसेंस आलोक कुमार:
आरती डिस्टलरी 2020 से चल रही है और उस समय डिप्टी लाइसेंस रहे वर्तमान में डिप्टी देवी पाटन मंडल आलोक कुमार ने भी यहां बड़ा खेल किया है। डिस्टलरी द्वारा अरबो रुपए की लाइसेंस फीस चोरी करने और उत्पादन शुल्क चोरी करने में पूरी मदद की। उन्होंने डिस्टलरी की वास्तविक उत्पादन क्षमता को नजरअंदाज किया और डिस्टलरी द्वारा घोषित उत्पादन क्षमता के आधार पर ही लाइसेंस फीस का निर्धारण कर दिया ।इस खेल में बड़ा सौदा हुआ है। आलोक कुमार यदि सक्रिय होते तो आरती डिस्टलरी को ऐसा घोटाला करने का मौका नहीं मिलता। चर्चा यह भी है कि आलोक कुमार का भी कथित रूप से इस कंपनी में इन्वेस्टमेंट है।
वर्तमान प्राविधिक अधिकारी संदीप मोडवेल और मृतक आश्रित कोटे में फर्जी ढंग से नियुक्त लिपिक अनिल यादव ने घोटाले को दिया अंजाम:
बताया जा रहा है कि टास्क फोर्स में सहायक अधिकारी आयुक्त के रूप में नियुक्त संदीप मोडवेल जो नॉन टेक्निकल है और जिनकी नियुक्ति स्वतंत्रता सेनानी कोट के जरिए हुई थी इसी घोटाले को अंजाम देने के लिए पूर्व में एडिशनल कमिश्नर लाइसेंस रह चुके हरिश्चंद्र श्रीवास्तव जो इस समय ठेके पर विभाग में काम कर रहे हैं उनकी सिफारिश पर चर्चित आबकारी आयुक्त ने नियम के विरुद्ध प्रभारी प्राविधिक अधिकारी के रूप में पोस्टिंग कर दी जबकि ऐसी नियुक्ति शासन द्वारा की जानी चाहिए थी। इतना ही नहीं अनिल यादव जिनका पूर्व डिप्टी एक्साइज कमिश्नर कार्मिक देशराज यादव ने फर्जी ढंग से मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति देवी बिना किसी जांच पड़ताल के वही अनिल यादव आरती डिस्टलरी की उत्पादन क्षमता बढ़ाने की पत्रावली तैयार करके अग्रसारित किया। बड़ा सवाल यही है कि संदीप मोडवेल के फर्जी निरीक्षण रिपोर्ट पर डिस्टलरी का उत्पादन क्षमता बढ़ाने की अनुमति शासन ने कैसे दे दी।
उत्पादन क्षमता बढ़ाने की पत्रावली में व्यापक फर्जी वाड़ा:
संदीप मोदवेल और अनिल यादव ने किस कदर फर्जी वादा किया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह कभी भी निरीक्षण करने आरती डिस्टलरी में गए ही नहीं बल्कि डिस्टलरी द्वारा जो अनुरोध और अनुरोध के साथ जो संलग्न दिया गया उसको सही मानते हुए अपनी संस्तुति भेज दी। अभी पता चला है कि डिस्टलरी का फर्मेंटर रिसीवर और स्टोरेज वही है जो स्थापना यानी 2020 के समय था जब इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो उत्पादन क्षमता में वृद्धि कैसे हो गई।
जानकारों का मानना है कि यदि उत्पादन क्षमता में वृद्धि नियम अनुसार की गई होती तो डिस्टलरी में कम से कम 80 करोड रुपए का निवेश किया जाता और इससे विभाग का निवेश आंकड़ा भी बढ़ जाता लेकिन अधिकारियों और कंपनी की मिली भगत से विभाग को जहां अरबो रुपए का चूना लगा है वहीं अधिकारियों के निजी राजस्व में भारी इजाफा हुआ है।
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