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फुटकर दुकानों की लाइसेंस फीस 20% तक बढ़ाए जाने की खबर: मंजूरी के लिए कैबिनेट में आबकारी पॉलिसी भेजे जाने की चर्चा:



लखनऊ।प्रदेश की नई आबकारी पॉलिसी को लेकर बड़ा और संवेदनशील प्रस्ताव सामने आया है। फुटकर शराब दुकानों की लाइसेंस फीस में 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की चर्चा तेज है। विश्वसनीय विभागीय सूत्रों के मुताबिक यह प्रस्ताव कैबिनेट मंजूरी के लिए भेज दिया गया है, जिसके बाद आबकारी विभाग से लेकर फुटकर कारोबारियों तक बेचैनी बढ़ गई है।
दबाव में चल रहे फुटकर अनुज्ञापन, समर्पण का खतरा
फुटकर अनुज्ञापन पहले से ही घटती बिक्री, सीमित मार्जिन, सख्त निगरानी और ओवररेटिंग पर कार्रवाई के दबाव में हैं। ऐसे में फीस में भारी बढ़ोतरी होने पर कई दुकानों के समर्पण (सरेंडर) की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में अनुज्ञापन समर्पित होते हैं, तो ग्राउंड लेवल पर व्यवस्था चरमरा सकती है।
मार्च का कोटा फरवरी में उठाना होगा मुश्किल
आबकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा वित्तीय वर्ष के अंतिम दो महीनों—फरवरी और मार्च—में आता है। सामान्य परिस्थितियों में मार्च के लक्ष्य का कुछ हिस्सा फरवरी में एडजस्ट किया जाता है, लेकिन—
दुकानों के बंद होने
उठान घटने
सप्लाई चेन बाधित होने
की स्थिति में मार्च का कोटा फरवरी में लगना लगभग असंभव हो जाएगा। इससे सरकार के वार्षिक राजस्व लक्ष्य पर सीधा असर पड़ सकता है।
राजस्व बढ़ेगा या उलटा घटेगा?
जहां विभाग इसे राजस्व बढ़ाने का कदम मान रहा है, वहीं जानकार इसे उलटे असर वाला फैसला बता रहे हैं। उनका कहना है कि फीस वृद्धि से—
लाइसेंस फीस तो बढ़ सकती है
लेकिन कुल बिक्री और उठान घटने से
ओवरऑल राजस्व में गिरावट का खतरा बढ़ जाएगा
यानी नीति दोधारी तलवार साबित हो सकती है।
नीति के पीछे किसका फायदा?
इस प्रस्ताव को लेकर यह सवाल भी गूंजने लगे हैं कि—
क्या छोटे और मध्यम फुटकर अनुज्ञापियों को बाहर करने की रणनीति बनाई जा रही है?
क्या इससे चुनिंदा बड़े समूहों या शराब लॉबी को अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा?
क्या नीति बनाते समय मैदानी हालात और आर्थिक व्यवहारिकता का पर्याप्त आकलन किया गया?
कैबिनेट के फैसले पर टिकी निगाहें
अब सबकी नजर कैबिनेट पर है। मंजूरी मिलने की स्थिति में यह फैसला
फुटकर शराब कारोबार, राजस्व व्यवस्था और प्रशासनिक संतुलन—तीनों पर गहरा असर डाल सकता है।

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