
आबकारी विभाग में बड़ा सत्ता परिवर्तन: कमिश्नर छुट्टी पर, एडिशनल कमिश्नर नवनीत सेहरा के हाथ में कमान; ‘सिंडिकेट’ को लेकर उठे सवाल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग में हाल ही में हुए प्रशासनिक घटनाक्रम ने विभागीय और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। विभाग के आबकारी कमिश्नर के लंबी छुट्टी पर चले जाने के बाद शासन स्तर पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया है। इन जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा एडिशनल कमिश्नर नवनीत सेहरा को सौंपे जाने के बाद विभाग की कमान प्रभावी रूप से उनके हाथों में केंद्रित होती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में विभाग की कई अहम फाइलें, प्रवर्तन से जुड़े निर्णय और राजस्व संबंधी मामलों की निगरानी सीधे एडिशनल कमिश्नर स्तर से की जा रही है। इससे विभाग के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आबकारी विभाग में सत्ता का नया केंद्र बन गया है। कई अधिकारियों का मानना है कि इस व्यवस्था के बाद कमिश्नर स्तर की भूमिका पहले की तुलना में सीमित होती दिखाई दे रही है।
बताया जा रहा है कि प्रमुख सचिव की ओर से की गई नई प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कई महत्वपूर्ण मामलों की मॉनिटरिंग और निर्णय प्रक्रिया को पुनर्गठित किया गया है। इससे विभाग के भीतर कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव महसूस किया जा रहा है।
आबकारी विभाग पहले भी कई मुद्दों को लेकर चर्चा में रहा है। ओवररेटिंग, प्रवर्तन की चुनिंदा कार्रवाइयों और राजस्व लक्ष्य को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में यह प्रशासनिक फेरबदल और भी ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है।
इसी के साथ एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आबकारी विभाग के भीतर किसी तरह का संगठित तंत्र या ‘सिंडिकेट’ सक्रिय है, जिसके प्रभाव में विभागीय फैसले लिए जा रहे हों। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण निर्णयों और कार्यवाहियों में कुछ सीमित अधिकारियों की भूमिका प्रमुख रूप से सामने आती रही है, जिससे इस तरह की चर्चाओं को और बल मिल रहा है।
हालांकि शासन के स्तर पर इसे सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि कमिश्नर के अवकाश पर होने की स्थिति में विभाग के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह जिम्मेदारियां दी गई हैं। लेकिन विभाग के अंदर और बाहर उठ रहे सवाल फिलहाल थमते नजर नहीं आ रहे हैं।
अब नजर इस बात पर है कि आने वाले समय में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली किस दिशा में जाती है और क्या ‘सिंडिकेट’ को लेकर उठ रहे सवालों पर शासन की ओर से कोई स्पष्ट स्थिति सामने आती है।




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