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राजस्व लक्ष्य से ₹2500 करोड़ पीछे आबकारी विभाग, प्रमुख सचिव सख्त—टॉप 5 जिलों के अधिकारियों पर गिरी गाज:


लखनऊ/प्रयागराज।
उत्तर प्रदेश का आबकारी विभाग चालू वित्तीय वर्ष में अपने राजस्व लक्ष्य से करीब ₹2500 करोड़ पीछे चल रहा है। इस गंभीर स्थिति पर प्रमुख सचिव (आबकारी) ने कड़ी नाराजगी जताते हुए विभागीय मशीनरी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैठक में साफ निर्देश दिए गए कि राजस्व अर्जन में फिसड्डी रहे टॉप-5 जिलों के जिला आबकारी अधिकारियों (DEO) को चार्जशीट दी जाए और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जाए।
“राजस्व नहीं आया तो जिम्मेदारी तय होगी” – प्रमुख सचिव
प्रमुख सचिव ने साफ कहा कि
 “राजस्व लक्ष्य किसी भी कीमत पर पूरा होना चाहिए, लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।”
उन्होंने यह भी संकेत दिए कि आने वाले समय में जवाबदेही तय कर बड़े स्तर पर कार्रवाई हो सकती है।
ग्रेटर नोएडा में विभाग खुद खोलेगा शराब की दुकान
राजस्व बढ़ाने के लिए एक बड़ा फैसला लेते हुए सरकार ने तय किया है कि
➡️ ग्रेटर नोएडा में आबकारी विभाग खुद जमीन खरीदकर शराब की दुकान संचालित करेगा
इस मॉडल को भविष्य में अन्य जिलों में भी लागू किया जा सकता है, ताकि निजी लाइसेंसधारियों पर निर्भरता कम हो और सीधा राजस्व बढ़े।
पुलिस-प्रशासन भी जिम्मेदार—काउंटर FIR की चेतावनी
प्रमुख सचिव ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि:
➡️ अगर बिना कारण शराब की दुकानों या बार पर कार्रवाई की गई,
➡️ तो आबकारी विभाग संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ काउंटर FIR दर्ज कराएगा
इस बयान से साफ है कि विभाग अब अपने राजस्व हितों को लेकर आक्रामक रुख अपनाने जा रहा है।
हरियाणा में महंगी बियर—UP के लिए मौका
बैठक में यह भी चर्चा हुई कि
➡️ हरियाणा में बियर की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं
इस पर प्रमुख सचिव ने कहा:
 “यह उत्तर प्रदेश के लिए बियर बिक्री बढ़ाने का सुनहरा अवसर है।”
यानी सीमावर्ती जिलों में बिक्री बढ़ाकर राजस्व में सुधार किया जा सकता है।
 क्यों पिछड़ गया आबकारी विभाग?—जवाबदेही की पड़ताल
अब सबसे बड़ा सवाल—₹2500 करोड़ की कमी का जिम्मेदार कौन?
1. नीतिगत कमजोरी (Policy Failure)
आबकारी नीति में बार-बार बदलाव से बाजार में अस्थिरता
लाइसेंस फीस और रेट तय करने में ग्राउंड रियलिटी की अनदेखी
 यह सीधे तौर पर कमिश्नर और प्रमुख सचिव स्तर की नीति निर्माण विफलता मानी जा रही है
2. जमीनी मॉनिटरिंग का अभाव
जिलों में अवैध शराब, ओवररेटिंग और तस्करी पर नियंत्रण कमजोर
टॉप अधिकारियों द्वारा नियमित समीक्षा और फील्ड विजिट की कमी
 सवाल: जब निगरानी नहीं होगी तो राजस्व कैसे बढ़ेगा?
3. पुलिस-आबकारी समन्वय की कमी
कई जगह पुलिस द्वारा दुकानों पर कार्रवाई से बिक्री प्रभावित
समन्वय की जगह टकराव की स्थिति
 यह प्रशासनिक विफलता सीधे ऊपरी नेतृत्व की समन्वय क्षमता पर सवाल उठाती है
4. अव्यवहारिक राजस्व लक्ष्य
कई जिलों को उनकी क्षमता से अधिक लक्ष्य दिया गया
वास्तविक खपत और बाजार विश्लेषण का अभाव
 इसका दोष केवल जिला अधिकारियों पर डालना उचित नहीं—यह टॉप प्लानिंग लेवल की गलती है
5. नवाचार की कमी (Lack of Innovation)
ई-मार्केटिंग, डिजिटल ट्रैकिंग, स्मार्ट रिटेल मॉडल लागू नहीं हुए
जबकि अन्य राज्यों में टेक्नोलॉजी से राजस्व बढ़ रहा है
⚖️ बड़ा सवाल: सिर्फ DEO दोषी या सिस्टम फेल?
टॉप-5 जिलों के अधिकारियों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन:
 क्या नीति बनाने वाले अधिकारी (कमिश्नर, प्रमुख सचिव) जिम्मेदारी से बच सकते हैं?
 क्या केवल फील्ड अफसरों पर कार्रवाई से ₹2500 करोड़ की कमी पूरी हो जाएगी?
茶 निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश का आबकारी विभाग इस समय राजस्व संकट, प्रशासनिक टकराव और नीतिगत कमजोरी के दौर से गुजर रहा है।
एक तरफ सख्त कार्रवाई के संकेत
दूसरी तरफ सिस्टम की खामियां उजागर

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