अवधभूमि

हिंदी न्यूज़, हिंदी समाचार

संघ का संदेश, भाजपा के नाम—‘हम रिमोट कंट्रोल नहीं’: नए अध्यक्ष को लेकर नाराज़गी के संकेत?


भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का यह बयान कि “संघ को केवल भाजपा के नजरिए से न देखें, RSS किसी का रिमोट कंट्रोल नहीं है”—सिर्फ वैचारिक स्पष्टता नहीं, बल्कि भाजपा संगठन के भीतर चल रहे सत्ता-संतुलन और नेतृत्व चयन पर एक सधा हुआ राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। खास तौर पर ऐसे समय में, जब भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं, इस बयान को संघ की असहजता और नाराज़गी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
संघ के शताब्दी कार्यक्रम के मंच से दिया गया यह वक्तव्य बताता है कि RSS अपनी स्वायत्त पहचान को रेखांकित करना चाहता है और यह संदेश देना चाहता है कि भाजपा के हर निर्णय का स्वचालित समर्थन संघ की ओर से मानकर न चला जाए।
अध्यक्ष चयन और संघ की भूमिका पर सवाल
भाजपा में परंपरागत रूप से अध्यक्ष चयन के समय संघ की राय और समन्वय को अहम माना जाता रहा है। लेकिन हालिया दौर में पार्टी का केंद्रीकृत और व्यक्ति-प्रधान मॉडल संघ की अपेक्षाओं से अलग दिशा में जाता दिख रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अध्यक्ष चयन में संगठनात्मक अनुभव और वैचारिक संतुलन के बजाय प्रबंधन-कौशल और सत्ता-समीकरण प्राथमिकता बन गए हैं—जो संघ को रास नहीं आ रहा।
“RSS भाजपा नहीं है”—किसके लिए संदेश?
भागवत का यह कथन कि संघ को भाजपा से जोड़कर देखना गलत है, जनता से अधिक भाजपा नेतृत्व के लिए संकेत माना जा रहा है। इसका निहितार्थ यह कि:
भाजपा अपनी नीतिगत कमियों का नैरेटिव संघ पर न डाले,
संघ को चुनावी इवेंट मैनेजमेंट की तरह न देखा जाए,
और नए अध्यक्ष के लिए यह स्पष्ट रहे कि सम्मान, संवाद और समन्वय के बिना समर्थन स्वाभाविक नहीं होगा।
बदले राजनीतिक हालात और संघ की चिंता
पिछले चुनावी नतीजों, बढ़ती जन-असंतुष्टि, महंगाई-बेरोज़गारी जैसे मुद्दों और संगठनात्मक थकान ने संघ को यह सोचने पर मजबूर किया है कि कहीं भाजपा की राजनीतिक लागत संघ की वैचारिक साख पर न आ जाए। यही वजह है कि संघ सत्ता से संतुलित दूरी बनाते हुए समाज-निर्माण की अपनी भूमिका को सामने रख रहा है।
भाजपा के लिए संभावित असर
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह असहजता बनी रहती है तो इसके संकेत ज़मीनी स्तर पर दिख सकते हैं—जैसे कैडर का उत्साह घटना, संगठनात्मक समन्वय में ढील और वैचारिक धार की मंदी। संघ खुला विरोध नहीं करता, लेकिन उत्साहहीन समर्थन भी किसी भी पार्टी के लिए महँगा पड़ सकता है।
निष्कर्ष
मोहन भागवत का बयान विद्रोह नहीं, चेतावनी है—और वह भी शालीन भाषा में। यह भाजपा को याद दिलाता है कि संघ न तो किसी का रिमोट कंट्रोल है और न ही राजनीतिक ढाल। नए भाजपा अध्यक्ष के लिए यह संदेश साफ है: संघ का समर्थन सम्मान, संवाद और संगठनात्मक संतुलन से ही टिकेगा।

About Author