

लखीमपुर खीरी/सहारनपुर: आबकारी विभाग में तैनात शैलेंद्र कुमार तिवारी के मामलों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सहारनपुर में पहले विवादित तैनाती के आरोपों के बाद अब लखीमपुर खीरी में आरटीआई के जरिए खुलासा हुआ है कि उनकी खमर खेड़ा डिस्टलरी में तैनाती के दौरान 13 महीने तक वेतन निर्गत नहीं किया गया।
13 महीने बिना वेतन: तैनाती की वैधता पर प्रश्न
जिला आबकारी अधिकारी राजवीर सिंह ने आरटीआई के जवाब में बताया कि शैलेंद्र कुमार तिवारी 2 जुलाई 2019 से 5 अक्टूबर 2020 तक खमर खेड़ा डिस्टलरी में तैनात रहे।
लेकिन इस पूरे समय में उनका वेतन जारी नहीं हुआ। इससे स्वाभाविक सवाल उठते हैं:
क्या वेतन न होने के बावजूद यह तैनाती वैध मानी जा सकती है?
क्या अधिकारी बिना वेतन कार्यरत थे, या उनकी तैनाती केवल कागजों में ही रही?
इस अवधि में उनके द्वारा किए गए निर्णयों की कानूनी वैधता पर भी प्रश्न उठते हैं।
सहारनपुर में भी विवादित रिकॉर्ड
यह मामला पहले सहारनपुर में उनकी प्रवर्तन-दो तैनाती से जुड़े विवाद को याद दिलाता है। उस समय आरोप थे कि:
बिना पे-मेमो वेतन भुगतान किया गया
विभागीय नियमों और प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ
वित्तीय रिकॉर्ड और तैनाती आदेश में स्पष्ट असंगतियां थीं
दो अलग-अलग जनपदों में एक ही अधिकारी से जुड़े ये मामले प्रशासनिक और वित्तीय प्रणाली की खामियों को उजागर करते हैं।
उच्च अधिकारियों की जवाबदेही
इन दोनों मामलों से स्पष्ट होता है कि यह केवल व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी की कमी और उच्च अधिकारियों की जवाबदेही का विषय है।
क्या तत्कालीन प्रमुख सचिव आबकारी विभाग और संबंधित कमिश्नर इस दौरान जानकारी में थे?
अगर जानकारी थी, तो क्यों कोई कार्रवाई नहीं की गई?
यदि जानकारी नहीं थी, तो यह विभागीय नियंत्रण की साफ़ विफलता है।
वेतन और तैनाती में गड़बड़ी: गंभीर प्रशासनिक प्रश्न
तैनाती और वेतन नियमों की अनदेखी क्यों हुई?
क्या यह मामला किसी संरचित प्रशासनिक गड़बड़ी या संरक्षण का संकेत है?
13 महीने बिना वेतन कार्यरत होने के दौरान विभागीय कार्य और निर्णयों की वैधता क्या है?
जांच और जवाबदेही की मांग
विशेषज्ञों का मानना है कि अब यह मामला केवल लखीमपुर खीरी तक सीमित नहीं है। सहारनपुर और लखीमपुर खीरी—दोनों प्रकरणों को मिलाकर देखा जाए तो:
तत्कालीन प्रमुख सचिव आबकारी विभाग
संबंधित कमिश्नर
दोनों जनपदों के जिला आबकारी अधिकारी और लेखा शाखा
सभी की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
निष्कर्ष
शैलेंद्र कुमार तिवारी से जुड़े ये मामले विभाग की पारदर्शिता और प्रशासनिक साख पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
अब यह देखना होगा कि शासन स्तर पर क्या कार्रवाई की जाती है—क्या यह केवल फाइलों में दब जाएगा, या वास्तविक जवाबदेही तय की जाएगी।




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