
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सस्ती देशी शराब उपलब्ध कराने के नाम पर चलाई जा रही यूपीएमएल (UPML) व्यवस्था अब एक बहुस्तरीय आर्थिक घोटाले की ओर इशारा कर रही है। ऐसी चर्चा है कि कागज़ों में गरीबों के लिए सस्ती शराब, लेकिन ज़मीनी हकीकत में एफसीआई, डिस्टिलरी, आबकारी विभाग और सांख्यिकी तंत्र की मिलीभगत से राज्य को कई सौ करोड़ का नुकसान होने के गंभीर संकेत सामने आ रहे हैं। सच्चाई तभी सामने आएगी जब आबकारी विभाग विंदुवार स्पष्टीकरण जारी करे।
एफसीआई के चावल का खेल: सस्ती शराब या खुला बाजार?
पड़ताल में सामने आया है कि—
एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) से
बेहद कम दरों पर
उच्च गुणवत्ता वाला लाखों कुंतल चावल
देशी शराब निर्माण के नाम पर उठाया गया।
लेकिन सवाल यह है कि— ❓ क्या सारा चावल वास्तव में शराब निर्माण में गया?
❓ या फिर अच्छी क्वालिटी का चावल खुले बाजार में मोटे मुनाफे पर बेच दिया गया?
सूत्रों के मुताबिक, उत्तम क्वालिटी के एफसीआई चावल को बाजार में बेचकर भारी रकम बनाई गई, जबकि शराब निर्माण के लिए सस्ता, घटिया और टूटा हुआ खंडा चावल खरीदा गया।
離 तकनीकी सच्चाई: अच्छी और खराब क्वालिटी के चावल में फर्क
शराब और एथेनॉल निर्माण की प्रक्रिया साफ कहती है—
अच्छी क्वालिटी का चावल
✔ अधिक स्टार्च
✔ अधिक शुगर
✔ फर्मेंटेशन से अधिक एथेनॉल रिकवरी
घटिया/खंडा चावल
✖ कम स्टार्च
✖ कम शुगर
✖ शराब/एथेनॉल की कम रिकवरी
यानी, अगर कागज़ों में अच्छी क्वालिटी का चावल दिखाया जाए और हकीकत में घटिया चावल इस्तेमाल हो—
तो रिकवरी में अंतर सीधे घोटाले की ओर इशारा करता है।
मक्का बनाम चावल: रेट का बड़ा खेल
एक और बड़ा सवाल—
मक्का से बने एथेनॉल और
चावल से बने एथेनॉल
दोनों के दामों में भारी अंतर है।
यदि—
कागज़ों में चावल से एथेनॉल दिखाया जाए
और वास्तविक उत्पादन मक्का या मिश्रित घटिया कच्चे माल से हो
तो यह टैक्स चोरी + रॉयल्टी चोरी + उत्पादन घोटाला बनता है।
⚫ इनकम टैक्स और उत्पादन चोरी
पड़ताल में यह भी संकेत मिल रहे हैं कि—
कई डिस्टिलरी
❌ वास्तविक उत्पादन कम दिखा रही हैं
❌ एथेनॉल रिकवरी छिपा रही हैं
❌ इनकम टैक्स और जीएसटी की बड़ी चोरी कर रही हैं
लेकिन सवाल यह है— ❓ जब रिकवरी डेटा ही संदिग्ध है,
❓ तो सरकार कैसे सही राजस्व आंकलन करेगी?
सबसे बड़ा सवाल: नियंत्रण किसका?
मोलसेस (शीरा) पर आबकारी आयुक्त का स्पष्ट नियंत्रण है
लेकिन
चावल और मक्का
एफसीआई से उठान
उससे बने एथेनॉल
इन पर आबकारी विभाग का कोई स्पष्ट नियंत्रण नहीं।
❓ फिर आबकारी आयुक्त कैसे दावा कर सकते हैं कि—
कितने कच्चे माल से
कितनी शराब या एथेनॉल बनी?
❓ आबकारी नीति में—
चावल/मक्का आधारित एथेनॉल के लिए
स्पष्ट नियम, उपनियम और ऑडिट सिस्टम क्यों नहीं?
यूपीएमएल की शराब बेचने का दबाव क्यों?
एक और चौंकाने वाला तथ्य—
आबकारी विभाग के अधिकारी
यूपीएमएल की देशी शराब बेचने पर असामान्य जोर दे रहे हैं।
सवाल उठता है— ❓ क्या यह जोर राजस्व के लिए है
या
❓ किसी तयशुदा डिस्टिलरी नेटवर्क को फायदा पहुंचाने के लिए?
⚫ सांख्यिकी + डिस्टिलरी + विभाग = सुनियोजित खेल?
सूत्रों का दावा है कि—
डिस्टिलरी उत्पादन में हेरफेर करती हैं
सांख्यिकी विभाग आंकड़े मैनेज करता है
आबकारी तंत्र आंख मूंदे रहता है
नतीजा:
उत्तर प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये का चूना।
जिन सवालों के जवाब चाहिए
एफसीआई से उठाए गए चावल की क्वालिटी ऑडिट रिपोर्ट कहां है?
वास्तविक स्टार्च/शुगर रिकवरी का स्वतंत्र परीक्षण क्यों नहीं?
चावल व मक्का आधारित एथेनॉल पर अलग से आबकारी नियंत्रण क्यों नहीं?
डिस्टिलरी-वार इनपुट बनाम आउटपुट ऑडिट कब हुआ?
यूपीएमएल ब्रांड को बढ़ावा देने के पीछे कौन लाभार्थी है?
निष्कर्ष
यह मामला केवल शराब का नहीं,
एफसीआई के अनाज
एथेनॉल नीति
आबकारी नियंत्रण
टैक्स चोरी
और
राज्य राजस्व की लूट
से जुड़ा संगठित घोटाला प्रतीत होता है।
अगर निष्पक्ष जांच हुई, तो यह घोटाला कई सौ करोड़ का निकल सकता है।
🌽 मक्के से एथेनॉल रिकवरी – तकनीकी व नियम आधारित विवरण
📌 एथेनॉल निर्माण में उपयोग होने वाला मक्का क्या होना चाहिए?
Ethanol Blending Programme (EBP) और औद्योगिक मानकों के अनुसार एथेनॉल निर्माण के लिए मक्का—
परिपक्व (Matured)
नमी ≤ 14%
फफूंद व कीट मुक्त
स्टार्च युक्त (60–65%)
होना अनिवार्य है।
🟢 अच्छी क्वालिटी मक्का – एथेनॉल रिकवरी
तकनीकी मानकों के अनुसार—
1 मीट्रिक टन अच्छी क्वालिटी मक्का
👉 औसतन 380 से 410 लीटर एथेनॉल देता है।
क्योंकि—
स्टार्च मात्रा 60–65%
शुगर कन्वर्ज़न एफिशिएंसी अधिक
फर्मेंटेशन लॉस न्यूनतम
👉 यही कारण है कि मक्का आधारित एथेनॉल का सरकारी बेंचमार्क तय किया गया है।
🔴 खराब क्वालिटी मक्का – एथेनॉल रिकवरी
खराब मक्का किसे कहते हैं?
नमी > 15–16%
फफूंद/एफ्लाटॉक्सिन प्रभावित
टूटे/अधपके दाने
लंबे समय तक भंडारित, डिसकलर मक्का
🟠 खराब मक्के से औसत एथेनॉल रिकवरी
औद्योगिक परीक्षणों के अनुसार—
1 मीट्रिक टन खराब/घटिया मक्का
👉 केवल 300 से 340 लीटर एथेनॉल देता है।
कारण—
स्टार्च घटकर 50–55%
शुगर कन्वर्ज़न अधूरा
यीस्ट इनहिबिशन (फफूंद/नमी के कारण)
⚠️ रिकवरी अंतर क्या उजागर करता है?
यदि—
रिकॉर्ड में अच्छी क्वालिटी मक्का दर्शाई जाए
लेकिन एथेनॉल रिकवरी
👉 300–340 लीटर/टन बताई जाए
तो यह दर्शाता है—
घटिया मक्का का उपयोग
या उत्पादन/रिकवरी छुपाना
➡️ यह तकनीकी रूप से मापने योग्य अनियमितता है।
📜 नियमों के संदर्भ में उल्लंघन
ऐसी स्थिति में उल्लंघन होता है—
Ethanol Blending Programme (EBP) – रिकवरी मानक
Collection of Statistics Act, 2008 – झूठा उत्पादन डेटा
GST Act, 2017 – अघोषित उत्पादन/बिक्री
Income Tax Act, 1961 – आय छुपाना
UP Excise Act, 1910 – राजस्व क्षति
“तकनीकी मानकों के अनुसार अच्छी क्वालिटी के मक्के से औसतन 380–410 लीटर प्रति मीट्रिक टन एथेनॉल प्राप्त होता है, जबकि खराब या नमी-युक्त मक्के से यह रिकवरी घटकर 300–340 लीटर प्रति मीट्रिक टन रह जाती है। यदि सरकारी रिकॉर्ड में उच्च गुणवत्ता का मक्का दर्शाकर कम रिकवरी दर्ज की गई है, तो यह कच्चे माल की हेराफेरी और उत्पादन छुपाने का ठोस तकनीकी संकेत है।”
।
नियमों के हवाले से प्रमाणित पड़ताल
यूपीएमएल के नाम पर सस्ती देशी शराब, नियमों की आड़ में कई सौ करोड़ का खेल
उत्तर प्रदेश में यूपीएमएल (UPML) के अंतर्गत देशी शराब निर्माण को लेकर सामने आए तथ्यों को यदि कानूनी नियमों और सरकारी प्रावधानों के तराजू पर तौला जाए, तो यह मामला केवल “प्रशासनिक चूक” नहीं बल्कि नियमित और संगठित उल्लंघन का प्रतीत होता है।
1. एफसीआई चावल उठान बनाम उपयोग
(Food Corporation of India Rules & NFSA)
नियम/प्रावधान:
NFSA, 2013
FCI (Movement & Disposal) Guidelines
केंद्र सरकार के निर्देशानुसार FCI का चावल
केवल निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए
निश्चित दर व शर्तों पर दिया जाता है
नियम स्पष्ट कहता है:
FCI से उठाया गया खाद्यान्न अन्य किसी व्यावसायिक या खुले बाजार में बिक्री हेतु नहीं बेचा जा सकता।
❓ उल्लंघन कहाँ?
यदि उत्तम क्वालिटी का चावल खुले बाजार में बेचा गया
और शराब निर्माण में घटिया खंडा चावल इस्तेमाल हुआ
तो यह सीधा उल्लंघन है:
Essential Commodities Act, 1955 – धारा 3 व 7
आपराधिक विश्वासघात व सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग
2. चावल से एथेनॉल: रिकवरी का नियम
(Ethanol Blending Programme – EBP)
केंद्र सरकार / खाद्य मंत्रालय के नियम:
चावल, मक्का व अन्य अनाज से बनने वाले एथेनॉल की
स्टैंडर्ड रिकवरी प्रतिशत
इनपुट-आउटपुट गणना
तय है।
उच्च गुणवत्ता के चावल से अधिक एथेनॉल रिकवरी अनिवार्य है।
❓ उल्लंघन कहाँ?
यदि कागज़ों में अच्छी क्वालिटी का चावल
लेकिन उत्पादन में कम एथेनॉल रिकवरी दिखाई जाए
तो यह साबित करता है:
गलत कच्चा माल इस्तेमाल
या उत्पादन छुपाना
➡️ यह सीधा उल्लंघन है:
Factories Act, 1948
GST Act, 2017
Income Tax Act, 1961 (अघोषित उत्पादन)
3. आबकारी नीति में खामी या जानबूझकर छोड़ा गया रास्ता?
(UP Excise Policy & UP Excise Act, 1910)
स्पष्ट तथ्य:
मोलसेस पर
✔ आबकारी आयुक्त का
✔ उत्पादन, स्टॉक और निस्तारण नियंत्रण
लेकिन—
चावल व मक्का
उनसे बने एथेनॉल
इन पर UP Excise Act या नीति में स्पष्ट नियंत्रण नहीं।
❓ कानूनी सवाल
यदि कच्चा माल आबकारी नियंत्रण में नहीं,
तो उससे बनी शराब/एथेनॉल पर नियंत्रण कैसे?
यह नीति-निर्माण की गंभीर चूक है, जो
➡️ डिस्टिलरी को मनमानी की खुली छूट देती है।
4. सांख्यिकी अधिनियम का दुरुपयोग
(Collection of Statistics Act, 2008)
नियम कहता है:
उत्पादन, बिक्री व स्टॉक का डेटा
सत्य, प्रमाणिक और ऑडिट योग्य होना चाहिए।
❓ उल्लंघन कहाँ?
यदि डिस्टिलरी द्वारा दिया गया डेटा
❌ वास्तविक उत्पादन से मेल नहीं खाता
❌ रिकवरी प्रतिशत संदिग्ध है
तो यह अपराध है:
धारा 15 – झूठी सूचना देना
दंड व अभियोजन योग्य अपराध
⚫ 5. यूपीएमएल शराब बेचने का दबाव – नियमों की आड़?
(UP Excise Settlement Rules)
नियमों के अनुसार:
उपभोक्ता पर किसी एक ब्रांड की शराब थोपना
प्रतिस्पर्धा नियमों के विरुद्ध है।
यदि अधिकारी—
केवल यूपीएमएल की बिक्री पर जोर दें
तो यह बनता है:
Conflict of Interest
Cartelization
Competition Act, 2002 का उल्लंघन
6. हजारों करोड़ का नुकसान – जिम्मेदारी किसकी?
नियम स्पष्ट हैं:
UP Financial Rules
CAG Audit Mandate
राज्य राजस्व की हानि होने पर—
विभागीय अधिकारी
नीति निर्माता
निगरानी तंत्र
सभी सामूहिक रूप से जिम्मेदार होते हैं।
निष्कर्ष (Rule-Based)
नियमों के हवाले से यह स्पष्ट होता है कि—
✔ FCI चावल के दुरुपयोग की प्रबल संभावना
✔ एथेनॉल रिकवरी में जानबूझकर हेरफेर
✔ आबकारी नीति में जानबूझकर छोड़े गए लूपहोल
✔ सांख्यिकी और डिस्टिलरी की मिलीभगत
✔ यूपीएमएल के नाम पर बाज़ार नियंत्रण
यह पूरा मामला नीतिगत चूक नहीं बल्कि सुनियोजित घोटाला प्रतीत होता है।
✍️
🔬 खराब क्वालिटी चावल से एथेनॉल रिकवरी – तकनीकी प्रमाण
📌 खराब क्वालिटी चावल क्या कहलाता है?
औद्योगिक मानकों के अनुसार खराब/घटिया चावल में शामिल होते हैं—
टूटे (Broken) दाने
कीड़े लगे / फफूंदयुक्त दाने
नमी अधिक (Moisture > 14%)
लंबे समय तक भंडारित, डिसकलर चावल
👉 ऐसे चावल में स्टार्च की मात्रा कम और
👉 फर्मेंटेशन लॉस अधिक होता है।
🧪 खराब चावल से रिकवरी क्यों घटती है?
एथेनॉल निर्माण की प्रक्रिया—
चावल → स्टार्च → शुगर → फर्मेंटेशन → एथेनॉल
खराब चावल में—
❌ स्टार्च 55–60% तक गिर जाता है
❌ शुगर कन्वर्ज़न अधूरा रहता है
❌ यीस्ट एफिशिएंसी घटती है
🟠 खराब क्वालिटी चावल से एथेनॉल रिकवरी (औसत)
औद्योगिक और सरकारी टेक्निकल गाइडलाइंस के अनुसार—
1 मीट्रिक टन खराब/खंडा चावल
👉 औसतन 300 से 350 लीटर एथेनॉल ही देता है
जबकि—
अच्छी क्वालिटी का चावल
👉 430–460 लीटर/टन देता है।
⚠️ रिकवरी में अंतर क्या साबित करता है?
यदि—
कागज़ों में अच्छी क्वालिटी का चावल (FCI ग्रेड) दिखाया जाए
लेकिन एथेनॉल रिकवरी
👉 300–350 लीटर/टन बताई जाए
तो यह दर्शाता है—
वास्तविक कच्चा माल घटिया था
या उत्पादन/रिकवरी जानबूझकर छुपाई गई
➡️ यह सीधे-सीधे घोटाले का तकनीकी प्रमाण बनता है।
📜 नियमों के संदर्भ में उल्लंघन
इस स्थिति में उल्लंघन होता है—
Ethanol Blending Programme (EBP) के रिकवरी मानक
Collection of Statistics Act, 2008 – गलत डेटा
GST Act, 2017 – अघोषित उत्पादन
Income Tax Act, 1961 – टैक्स चोरी
UP Excise Act, 1910 – राजस्व हानि
“तकनीकी मानकों के अनुसार खराब/खंडा क्वालिटी के चावल से अधिकतम 300–350 लीटर प्रति मीट्रिक टन ही एथेनॉल रिकवरी संभव है, जबकि अच्छी क्वालिटी के चावल से 430–460 लीटर तक एथेनॉल प्राप्त होता है। यदि रिकॉर्ड में उच्च गुणवत्ता का चावल दिखाकर कम रिकवरी दर्ज की गई है, तो यह कच्चे माल के दुरुपयोग और उत्पादन छुपाने का स्पष्ट संकेत है।”
बड़ा सवाल: जब ग्रेन-बेस्ड एथेनॉल की जांच की व्यवस्था ही नहीं, तो रिपोर्ट कैसे?
उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग की प्रयोगशालाओं की संरचना पर यदि तकनीकी दृष्टि से नजर डाली जाए, तो एक गंभीर विसंगति सामने आती है।
स्थापित तथ्य
आबकारी विभाग की लैब में
✔ मोलसेस (शीरा) आधारित एथेनॉल की
✔ रासायनिक जांच (Strength, ENA parameters आदि)
की मानक व्यवस्था उपलब्ध है।
लेकिन— ❌ ग्रेन-बेस्ड (चावल/मक्का) एथेनॉल की
❌ विशिष्ट पहचान, सोर्स-वेरिफिकेशन और रिकवरी-आधारित
❌ अलग टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर
आबकारी विभाग की किसी भी अधिसूचना में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है।
離 तकनीकी सच्चाई: मोलसेस और ग्रेन एथेनॉल की जांच अलग होती है
औद्योगिक मानकों के अनुसार—
मोलसेस बेस्ड एथेनॉल
→ शीरा-जनित अशुद्धियाँ
→ अलग फर्मेंटेशन प्रोफाइल
ग्रेन बेस्ड एथेनॉल
→ स्टार्च-टू-शुगर कन्वर्ज़न
→ अलग Congener प्रोफाइल
→ अलग Isotopic / Chemical markers
दोनों की टेस्टिंग मेथडोलॉजी समान नहीं हो सकती।
⚠️ निर्णायक सवाल
जब—
आबकारी विभाग के पास
❓ ग्रेन-बेस्ड एथेनॉल की अलग मान्यता प्राप्त लैब नहीं
❓ न ही रिकवरी-वेरिफिकेशन का कोई घोषित SOP
तो फिर—
❓ जो डिस्टिलरी ग्रेन से बनी शराब/एथेनॉल के सैंपल
❓ विभागीय लैब में भेज रही हैं
❓ और जिन पर “टेस्ट रिपोर्ट” जारी हो रही है—
उन रिपोर्टों का तकनीकी आधार क्या है?
नियमों के संदर्भ में गंभीर विसंगति
1️⃣ UP Excise Act, 1910
आबकारी आयुक्त को
✔ गुणवत्ता नियंत्रण
✔ परीक्षण व्यवस्था
सुनिश्चित करने का दायित्व देता है।
यदि—
परीक्षण की तकनीकी क्षमता ही उपलब्ध नहीं,
तो रिपोर्ट की वैधता प्रश्नों के घेरे में आती है।
2️⃣ BIS / औद्योगिक लैब मानक
किसी भी लैब रिपोर्ट के लिए
✔ उपयुक्त उपकरण
✔ मान्य पद्धति
✔ प्रशिक्षित विश्लेषक
अनिवार्य हैं।
बिना ग्रेन-स्पेसिफिक टेस्टिंग के— रिपोर्ट अनुमान आधारित मानी जाएगी,
न कि वैज्ञानिक प्रमाण।
3️⃣ Collection of Statistics Act, 2008
उत्पादन और गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े
✔ सत्य
✔ परीक्षण-योग्य
होने चाहिए।
यदि टेस्टिंग ही संभव नहीं— तो आंकड़े स्वतः संदिग्ध हो जाते हैं।
क्या रिपोर्ट फर्जी है? — कानूनी सवाल
यह कहना कि रिपोर्ट “फर्जी है” एक कानूनी निष्कर्ष होगा,
लेकिन यह पूरी तरह वैध सवाल है कि—
❓ जब ग्रेन-बेस्ड एथेनॉल की जांच की अधिसूचित व्यवस्था ही नहीं,
तो जारी की जा रही लैब रिपोर्ट
किस वैज्ञानिक और कानूनी आधार पर बनाई जा रही है?
यदि—
रिपोर्ट बिना सक्षम टेस्टिंग के बनी है,
तो वह—
Misleading
Procedurally invalid
और ऑडिट में अस्वीकार्य
हो सकती है।
आखिर क्यों?
“आबकारी विभाग की प्रयोगशालाओं में मोलसेस आधारित एथेनॉल की जांच की व्यवस्था तो मौजूद है, लेकिन ग्रेन-बेस्ड एथेनॉल की पृथक और अधिसूचित टेस्टिंग प्रणाली का अभाव है। ऐसे में यह गंभीर सवाल उठता है कि ग्रेन से बनी शराब और एथेनॉल के जिन नमूनों पर विभागीय लैब रिपोर्ट जारी हो रही है, उनका वैज्ञानिक और कानूनी आधार क्या है। बिना सक्षम जांच व्यवस्था के जारी रिपोर्टों की प्रमाणिकता स्वतः संदेह के घेरे में आती है।”
निष्कर्ष
यह मामला—
केवल लैब का नहीं
बल्कि नियामक विफलता,
नीति-स्तरीय चूक,
और संभावित आंकड़ा-प्रबंधन
की ओर इशारा करता है।
यदि स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट हुआ,
तो डिस्टिलरी उत्पादन, एथेनॉल रिकवरी और टैक्स भुगतान—
तीनों पर बड़े सवाल खड़े हो सकते हैं।
उठ रहे सवालों पर आबकारी विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए जिससे तमाम घपले और घोटालो की आशंकाओं पर विराम लग सके। आबकारी विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि धामपुर चीनी मिल डिस्टिलरी पर आयकर विभाग की रेड क्यो पड़ी और इस संबंध में डिस्टिलरी से क्या स्पष्टीकरण लिया गया।




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