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चार्ज शीटेड निरीक्षक के हवाले आबकारी विभाग की पर्सनल शाखा:बाबुओं की डीपीसी पर घमासान:



आबकारी विभाग में लिपिक संवर्ग की विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) को लेकर चल रही चर्चाओं ने अब गंभीर रूप ले लिया है। ब्रॉड लिस्ट और ग्रेडेशन लिस्ट में कथित हेरफेर की चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आरोप पत्र प्राप्त और जांचाधीन कर्मचारी को अब भी पर्सनल शाखा में संवेदनशील पत्रावलियों के निस्तारण का दायित्व क्यों सौंपा गया है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, आबकारी निरीक्षक प्रसेन रॉय, जिन्हें पूर्व में नियम विरुद्ध लंबे समय तक पर्सनल शाखा में जमे रहे और एक डिप्टी जो अब अवकाश प्राप्त है उनके ब्रॉड लिस्ट और ग्रेडेशन लिस्ट में हेराफेरी के आरोप में चार्जशीट दी गई थी और जिनके खिलाफ जांच अभी लंबित है, वे वर्तमान में भी नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों को देख रहे हैं।
कर्मचारियों के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि जब किसी अधिकारी पर विभागीय जांच चल रही हो, तो उसे संवेदनशील शाखा में बनाए रखना क्या प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप है? सामान्य प्रशासनिक परंपरा यह रही है कि जांचाधीन कर्मचारियों को संवेदनशील दायित्वों से हटाकर अन्यत्र समायोजित किया जाता है, ताकि जांच की निष्पक्षता पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे।
इस पूरे प्रकरण में डिप्टी कार्मिक कुमार प्रभात चंद, सहायक आबकारी आयुक्त (कार्मिक) मुबारक अली की भूमिका को लेकर भी विभागीय गलियारों में चर्चा है। वहीं आबकारी आयुक्त और एडिशनल कमिश्नर की चुप्पी ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह न केवल पदोन्नति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में अराजकता का भी संकेत है। कर्मचारियों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग की है।
फिलहाल विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन विभाग के भीतर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है।

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