
गोंडा। जिले में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। जिला आबकारी अधिकारी प्रगल्भ लवानिया और उनके साथ तैनात सिपाही राम मोहन की कथित कारगुजारियां इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई हैं। मामला इतना गंभीर बताया जा रहा है कि विभागीय टकराव से लेकर अवैध वसूली और मुखबिर तंत्र पर चोट जैसे आरोप उभरकर सामने आ रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार, 27 अप्रैल को तबरेज गंज कोतवाली क्षेत्र में एक पिपरमेंट (मेंथा) किसान को उसके ट्रैक्टर-ट्रॉली सहित रोककर कथित रूप से अवैध शराब तस्करी के आरोप में पकड़ लिया गया। कार्रवाई में सिपाही राम मोहन और जिला आबकारी अधिकारी स्वयं शामिल बताए जा रहे हैं। किसान को कोतवाली लाकर बंद कर दिया गया और उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी शुरू हुई।
लेकिन मामला तब पलट गया जब संबंधित सर्किल के इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार मौके पर पहुंचे। उन्होंने उक्त किसान को अपना मुखबिर बताते हुए उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने से साफ इनकार कर दिया।
⚡ बढ़ा विवाद, पहुंचा कमिश्नर तक
इंस्पेक्टर के इनकार से नाराज जिला आबकारी अधिकारी लवानिया ने मामले की शिकायत कमिश्नर से कर दी। बताया जा रहा है कि कमिश्नर ने इस पर नाराजगी जताते हुए लवानिया को कड़ी फटकार लगाई और मामले को डिप्टी स्तर पर सुलझाने के निर्देश दिए।
इसके बाद:
लवानिया की ओर से डिप्टी एक्साइज कमिश्नर आलोक कुमार को इंस्पेक्टर के खिलाफ पत्र भेजा गया
वहीं इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार ने भी आबकारी अधिकारी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए डिप्टी को पत्र लिखा
️♂️ इनसाइड स्टोरी: मुखबिर बना निशाना?
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ी अंदरूनी कहानी भी सामने आ रही है—
सिपाही राम मोहन को जिला आबकारी अधिकारी का “करीबी” बताया जा रहा है
दबी जुबान में यह भी चर्चा है कि वह कथित रूप से वसूली में शामिल रहता है
इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार ने हाल के दिनों में अवैध शराब के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई की थी
कई अवैध भट्टियां तोड़ी गईं और शराब माफियाओं पर शिकंजा कसा गया
बताया जा रहा है कि यही सख्ती आबकारी विभाग के कुछ लोगों को नागवार गुजर रही थी।
टारगेटेड कार्रवाई का आरोप
चर्चा के अनुसार:
पकड़ा गया मेंथा किसान, इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार का महत्वपूर्ण मुखबिर था
उसी के इनपुट पर कई बड़ी कार्रवाइयां हुई थीं
आरोप है कि आबकारी अधिकारी और सिपाही ने उसी मुखबिर को निशाना बनाकर गंभीर धाराओं में फंसाने की कोशिश की
लेकिन इंस्पेक्टर के खुलासे के बाद पूरा मामला उल्टा पड़ गया।
बड़े सवाल खड़े
इस घटना के बाद जिले में कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं—
क्या लोगों को चिन्हित कर उठाया जा रहा है?
क्या बिना मुकदमा दर्ज किए थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है?
क्या इसके जरिए वसूली का खेल चल रहा है?
क्या ईमानदार कार्रवाई करने वाले अधिकारियों के मुखबिरों को निशाना बनाया जा रहा है?
⚖️ जांच की मांग तेज
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों पर कार्रवाई हो।
निष्कर्ष:
गोंडा का यह मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी विवाद नहीं, बल्कि विभागीय टकराव, मुखबिर तंत्र और संभावित भ्रष्टाचार के जटिल जाल की ओर इशारा करता है। अगर आरोपों में सच्चाई है, तो यह कानून व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों के लिए बड़ा खतरा है।




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