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कोडीन कफ सिरप मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सदन में सफाई: कफ सिरप के सेवन से यूपी में कोई मौत नहीं:

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लखनऊ। कोडीन युक्त कफ सिरप को लेकर सदन में उठे सवालों के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस बार रक्षात्मक मुद्रा में नजर आए। विपक्ष के हमलों के बीच उन्होंने सरकार की ओर से सफाई तो दी, लेकिन उनके बयान के दौरान सत्ता पक्ष की बेंचों में भी कोई खास उत्साह दिखाई नहीं दिया। सदन में न तो तालियां गूंजीं और न ही आमतौर पर दिखने वाला जोश।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में कोडीन कफ सिरप से किसी भी प्रकार की मौत नहीं हुई है। उन्होंने विपक्ष पर तथ्य तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया और कहा कि यह पूरा मामला नकली दवाओं का नहीं, बल्कि अवैध डायवर्जन से जुड़ा हुआ है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि इस प्रकरण में एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है और इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार हाईकोर्ट में अपना पक्ष जीत चुकी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदेश में कोडीन कफ सिरप का कोई उत्पादन नहीं होता, यहां केवल इसके स्टॉकिस्ट और होलसेलर हैं। उत्पादन मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों में होता है।
योगी आदित्यनाथ ने सदन को अवगत कराया कि जिन राज्यों में मौत के मामले सामने आए हैं, वे अन्य राज्यों में बने सिरप से जुड़े हैं। विशेष रूप से उन्होंने तमिलनाडु में निर्मित सिरप से जुड़े मामलों का उल्लेख किया।
सरकार की कार्रवाई गिनाते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि अब तक इस मामले में
79 मुकदमे दर्ज,
225 अभियुक्त नामजद,
78 गिरफ्तारियां,
और 134 फर्मों पर छापेमारी की जा चुकी है।
उन्होंने दोहराया कि सरकार किसी भी दोषी को बख्शने के मूड में नहीं है और कानून के तहत कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।
हालांकि मुख्यमंत्री के इस लंबे स्पष्टीकरण के बावजूद सत्ता पक्ष की बेंचों पर सन्नाटा ही पसरा रहा। राजनीतिक गलियारों में इसे इस बात के संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि सरकार इस मुद्दे पर दबाव महसूस कर रही है।
विपक्ष ने सरकार की सफाई को नाकाफी बताते हुए कहा कि यदि यह अवैध डायवर्जन वर्षों से चल रहा था, तो ड्रग कंट्रोल, आबकारी और पुलिस तंत्र की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी। विपक्ष का कहना है कि पुराने लाइसेंसों का हवाला देकर सरकार अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती।
कोडीन कफ सिरप का मामला अब केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक जवाबदेही का सवाल बनता जा रहा है।

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