
प्रतापगढ़ जनपद के विकासखंड सांड़वा चंद्रिका के ग्राम गोराडांड़ में इंटरलॉकिंग सड़क निर्माण और बाद में उसे तोड़कर पैचवर्क कराने के मामले ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वित्त आयोग योजना के अंतर्गत वर्ष 2022-23 में ग्रामीण अभियंत्रण विभाग (आरईडी) द्वारा पक्की सड़क से बृजराज सिंह महाविद्यालय होते हुए दुलारा के बाग तक लगभग 530 मीटर इंटरलॉकिंग सड़क का निर्माण कराया गया था। इस कार्य पर करीब 40 लाख रुपये सरकारी धन खर्च हुआ था।
लेकिन निर्माण के लगभग एक वर्ष बाद लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) निर्माण खंड-2 द्वारा बिना किसी अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के इस इंटरलॉकिंग सड़क को आंशिक रूप से उखाड़ दिया गया और वहां पैचवर्क का कार्य करा दिया गया। आरोप है कि हटाई गई इंटरलॉकिंग ईंटों को सड़क किनारे फेंक दिया गया और बाद में उनका कोई स्पष्ट लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं कराया गया। इस पूरे प्रकरण में सरकारी संपत्ति की सुरक्षा, विभागीय समन्वय और वित्तीय नियमों के पालन को लेकर गंभीर अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है।
जांच में सामने आए तथ्य
प्रकरण की प्रारंभिक जांच जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की संयुक्त टीम द्वारा की गई। जांच में यह तथ्य सामने आया कि जहां इंटरलॉकिंग का निर्माण 530 मीटर लंबाई में हुआ था, वहीं लोक निर्माण विभाग, निर्माण खंड-2 द्वारा लगभग 800 मीटर क्षेत्र में पैचिंग कार्य करा दिया गया।
यह भी पाया गया कि इंटरलॉकिंग सड़क को हटाने से पहले ग्रामीण अभियंत्रण विभाग से कोई औपचारिक एनओसी नहीं ली गई थी, जबकि सरकारी निर्माण कार्यों में यह प्रक्रिया अनिवार्य मानी जाती है।
किस नियम के तहत किसकी जिम्मेदारी
सरकारी निर्माण कार्यों में उत्तर प्रदेश वित्तीय नियमावली, लोक निर्माण विभाग मैनुअल और वित्त आयोग योजना के दिशा-निर्देशों के तहत स्पष्ट व्यवस्था है कि किसी विभाग द्वारा निर्मित कार्य में दूसरे विभाग द्वारा परिवर्तन या मरम्मत करने से पहले संबंधित विभाग से लिखित अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करना अनिवार्य होता है।
ग्रामीण अभियंत्रण विभाग (आरईडी) की जिम्मेदारी
योजना के तहत कराए गए कार्य का पूरा तकनीकी और वित्तीय रिकॉर्ड सुरक्षित रखना।
माप पुस्तिका (एमबी), लागत और गुणवत्ता नियंत्रण की निगरानी करना।
यदि कार्य को दूसरे विभाग को सौंपा जाना हो तो विधिवत हस्तांतरण प्रक्रिया पूरी करना।
लोक निर्माण विभाग (निर्माण खंड-2) की जिम्मेदारी
दूसरे विभाग द्वारा निर्मित सड़क या संरचना में परिवर्तन से पहले एनओसी प्राप्त करना।
स्वीकृत सीमा और तकनीकी मानकों के भीतर ही मरम्मत या पैचवर्क कराना।
हटाई गई सामग्री का रिकॉर्ड तैयार करना और उसे सुरक्षित रखना।
संभावित नियम उल्लंघन और लापरवाही
प्रकरण में कई स्तरों पर नियमों के उल्लंघन की आशंका जताई जा रही है—
बिना एनओसी के दूसरे विभाग के निर्माण कार्य को तोड़ना।
स्वीकृत सीमा से अधिक क्षेत्र में पैचवर्क कराना।
सरकारी निर्माण सामग्री (इंटरलॉकिंग ईंटों) का समुचित संरक्षण न करना।
लगभग 40 लाख रुपये की लागत से बने कार्य को नुकसान पहुंचाना।
इन परिस्थितियों में यह सवाल भी उठ रहा है कि इंटरलॉकिंग ईंटों का वास्तविक हिसाब क्या है और वे आखिर कहां गईं।
किन धाराओं में दर्ज हो सकता है मुकदमा
यदि जांच में अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों के खिलाफ कई आपराधिक धाराओं में कार्रवाई संभव है।
धारा 409 (भारतीय दंड संहिता) – सरकारी संपत्ति के गबन या दुरुपयोग के मामले में।
धारा 420 – सरकारी धन या कार्य में धोखाधड़ी के आरोप में।
धारा 120-बी – अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत की स्थिति में आपराधिक षड्यंत्र।
धारा 201 – सबूत मिटाने या सरकारी सामग्री गायब करने के आरोप में।
इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी कार्रवाई संभव है।
जांच समिति की रिपोर्ट लंबित
मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तर पर संज्ञान लिया गया और मुख्य अभियंता, प्रयागराज क्षेत्र द्वारा निर्माण खंड-1 के अधिशासी अभियंता और स्टाफ ऑफिसर को शामिल करते हुए दो सदस्यीय जांच समिति गठित कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
हालांकि निर्देश दिए जाने के 15 दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जांच रिपोर्ट अभी तक प्रस्तुत नहीं की गई है, जिससे पूरे मामले में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।
एफआईआर के आदेश पर भी अमल नहीं
सूत्रों के अनुसार इस प्रकरण में जिलाधिकारी द्वारा संबंधित विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराने के निर्देश भी दिए गए थे, लेकिन अब तक उस आदेश का पालन नहीं किया गया है। इससे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
जवाबदेही तय होने का इंतजार
करीब 40 लाख रुपये की इंटरलॉकिंग सड़क के नुकसान और बिना एनओसी के कार्य कराए जाने के मामले में अब सभी की निगाहें लंबित जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि इस पूरे प्रकरण में किस अधिकारी, कर्मचारी या ठेकेदार की कितनी जिम्मेदारी तय होती है और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल यह मामला सरकारी निर्माण कार्यों में समन्वय की कमी, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही के अभाव का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।
ग्रामीण अभियंत्रण विभाग की लापरवाही और संभावित कार्रवाई
इस पूरे प्रकरण में ग्रामीण अभियंत्रण सेवा (आरईएस) की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग द्वारा वित्त आयोग योजना के तहत लगभग 40 लाख रुपये की लागत से 530 मीटर इंटरलॉकिंग सड़क का निर्माण कराया गया था, लेकिन निर्माण के बाद कार्य की निगरानी और संरक्षण को लेकर पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती गई। किसी अन्य विभाग द्वारा सड़क को तोड़ने या उसमें हस्तक्षेप करने से पहले विभाग को आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी तथा निर्माण सामग्री और संरचना की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए थी। इसके अलावा यदि मार्ग को किसी अन्य विभाग या संस्था को हस्तांतरित किया गया था तो उसकी विधिवत लिखित प्रक्रिया और अभिलेख भी स्पष्ट होने चाहिए थे। इन परिस्थितियों में प्रथम दृष्टया विभागीय स्तर पर कार्य की निगरानी में लापरवाही, सरकारी संपत्ति के संरक्षण में कमी और प्रशासनिक समन्वय की कमी सामने आती है। यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होते हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई, कारण बताओ नोटिस, वेतनवृद्धि रोकना, निलंबन तथा वित्तीय क्षति की वसूली जैसी कार्रवाई की जा सकती है।




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