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आबकारी विभाग का एक और कारनामा?        एक ही दिन, एक ही ट्रक, दो बिल और 700 किमी का रहस्यमय: सफ़रप्रयागराज–सहारनपुर शराब आपूर्ति में भारी अनियमितता की आशंका:


 आबकारी विभाग का एक और कारनामा?
एक ही दिन, एक ही ट्रक, दो बिल और 700 किमी का रहस्यमय सफ़र
प्रयागराज–सहारनपुर शराब आपूर्ति में भारी अनियमितता की आशंका
प्रयागराज।
उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इंडिया फूड प्रोडक्ट एंड ब्रेवरीज लिमिटेड, म्योहाल प्रयागराज के विदेशी मदिरा थोक अनुज्ञापन (FL-2) से 24 अक्टूबर 2009 को शराब आपूर्ति के दस्तावेजों में ऐसा विरोधाभास सामने आया है, जो सामान्य प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि व्यवस्थित गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।


 मामला क्या है?
दस्तावेजों के अनुसार—
GR नंबर: 570
ट्रक नंबर: UP70 AT 9332
प्रेषक: इंडिया फूड प्रोडक्ट एंड ब्रेवरीज लिमिटेड, म्योहाल (प्रयागराज)
प्राप्तकर्ता: पटियाला किंग लिकर प्रा. लि., सहारनपुर
इसी ट्रक से—
FL-2 बिल क्रमांक 10725 के माध्यम से सहारनपुर के लिए शराब भेजी गई
उसी दिन, उसी ट्रक से
उसी FL-2 से बिल क्रमांक 10724 पर फिर शराब भेजे जाने का रिकॉर्ड है
❓ सबसे बड़ा सवाल: यह कैसे संभव है?
प्रयागराज से सहारनपुर की दूरी लगभग 700 किलोमीटर है।
सामान्य स्थिति में—
ट्रक को एक तरफ जाने में ही 24–30 घंटे लगते हैं
आने-जाने में कम से कम 2 दिन
तो फिर सवाल यह है कि—
 ट्रक उसी दिन सहारनपुर गया
 उसी दिन वापस आया
 फिर उसी दिन दोबारा लोड होकर सहारनपुर चला गया
➡️ यह भौतिक रूप से संभव ही नहीं है।
⚠️ इससे क्या संकेत मिलता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला निम्न गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा करता है—
फर्जी परिवहन (Paper Transport)
ट्रक वास्तव में गया ही नहीं, सिर्फ कागज़ों में भेजा गया
डुप्लीकेट/बैकडेटेड बिलिंग
एक ही ट्रक को दिखाकर अलग-अलग बिलों पर शराब निकाली गई
शराब डायवर्जन की आशंका
शराब कहीं और खपाई गई, बिल सहारनपुर का काटा गया
राजस्व हानि (Excise Revenue Loss)
सरकार को टैक्स और ड्यूटी का भारी नुकसान संभव
 दूसरा अहम सवाल: सहारनपुर में शराब उपलब्ध होते हुए प्रयागराज से आपूर्ति क्यों?
सूत्रों के अनुसार—
सहारनपुर जनपद में संबंधित ब्रांड की उपलब्धता पहले से FL-2 पर मौजूद थी
ऐसे में प्रयागराज से शराब भेजने की कोई व्यावसायिक आवश्यकता नहीं बनती
तो फिर—
❓ क्या प्रयागराज स्थित FL-2 का इंडेक्स ब्रेवरी या किसी अन्य यूनिट से आंतरिक संबंध है?
❓ क्या यह एडजस्टमेंट एंट्री या स्टॉक मैनेजमेंट के नाम पर खेल है?
 जिम्मेदारी किसकी बनती है?
यदि यह रिकॉर्ड सही है, तो जिम्मेदारी तय होती है—
संबंधित FL-2 लाइसेंसी
उस दिन ड्यूटी पर तैनात आबकारी निरीक्षक
जिला आबकारी अधिकारी (DEO)
परिवहन पास जारी करने वाले अधिकारी
और यदि ऑनलाइन/मैनुअल सिस्टम से छेड़छाड़ हुई—तो तकनीकी शाखा भी
 कौन-कौन सी जांच होनी चाहिए?
इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच के लिए जरूरी है—
ट्रक नंबर UP70 AT 9332 की GPS/आरटीओ जांच
टोल प्लाज़ा डेटा (FASTag/मैनुअल एंट्री)
FL-2 स्टॉक रजिस्टर और गोदाम मिलान
GR नंबर 570 की लॉजिस्टिक कंपनी से पुष्टि
सहारनपुर FL-2 में वास्तविक रिसीविंग रिकॉर्ड
उस दिन ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों की भूमिका की जांच
⚖️ क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो—
संबंधित लाइसेंस निलंबन/निरस्तीकरण
दोषी अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई
आर्थिक दंड और रिकवरी
गंभीर स्थिति में FIR और आपराधिक मुकदमा
 निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ एक ट्रक या दो बिलों का नहीं है, बल्कि आबकारी व्यवस्था में गहरे बैठे सिस्टमेटिक खेल की ओर इशारा करता है। सवाल यह है कि—
क्या यह सिर्फ कागज़ी खेल था,
या फिर शराब और राजस्व की लूट का सुनियोजित मॉडल?
अब देखना यह है कि आबकारी विभाग खुद जांच करेगा या फिर यह फाइल भी बाकी मामलों की तरह दबा दी जाएगी।

समझ गया—इसे भी उसी खोजपरक, सवालों से घेरती और जवाबदेही तय करने वाली भाषा में आगे बढ़ाते हैं। नीचे यह हिस्सा आप मुख्य खबर का अगला पार्ट / फॉलो-अप रिपोर्ट या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं 
 गोदाम अब भी चालू, लेकिन सवाल अनुत्तरित
किसकी है यह गोदाम? पटियाला किंग लिकर से क्या है सीधा या परोक्ष संबंध?
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिस गोदाम से संबंधित अनियमित शराब आपूर्ति दर्ज है, वह गोदाम आज भी संचालित हो रही है।
ऐसे में सवाल केवल 2009 के बिलों तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि वर्तमान व्यवस्था और मौजूदा अधिकारियों की भूमिका पर भी आकर टिक जाता है।
❓ गोदाम किसकी है?
अब तक यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है कि—
प्रयागराज स्थित संबंधित FL-2 गोदाम का वास्तविक मालिक कौन है?
क्या यह गोदाम किसी व्यक्ति के नाम पर है या किसी कंपनी/ग्रुप के नियंत्रण में?
क्या गोदाम के मालिक या संचालक का पटियाला किंग लिकर प्राइवेट लिमिटेड, सहारनपुर से कोई—
व्यावसायिक साझेदारी
शेयरहोल्डिंग
या पारिवारिक/बेनामी संबंध
मौजूद है?
यदि ऐसा कोई संबंध है और उसे आबकारी विभाग से छुपाया गया, तो यह लाइसेंस शर्तों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।
⚠️ बिल–वाउचर की जांच क्यों नहीं हुई?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि—
जब एक ही दिन
एक ही ट्रक
और एक ही FL-2 से
दो अलग-अलग बिलों पर
शराब निकासी दिखाई गई,
तो अब तक बिल, वाउचर और स्टॉक रजिस्टर की विशेष जांच क्यों नहीं कराई गई?
क्या—
विभाग ने जानबूझकर जांच से आंख मूंदे रखी?
या फिर किसी स्तर पर मामला दबाने का प्रयास किया गया?
 क्या इसी गोदाम से शराब तस्करी की आशंका?
विशेषज्ञों और पूर्व आबकारी अधिकारियों का मानना है कि—
यदि कागज़ों में फर्जी निकासी दिखाई जाती रही हो
और वास्तविक भौतिक सत्यापन न हुआ हो
तो यह आशंका पूरी तरह से बनती है कि—
इसी गोदाम से शराब की अवैध तस्करी या डायवर्जन हुआ हो या अब भी हो रहा हो।
खासतौर पर—
दूसरे जनपदों में
बिना वैध आपूर्ति
या टैक्स चोरी के साथ
शराब भेजे जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
 वर्तमान आबकारी निरीक्षक (Excise Inspector – Wholesale) की जिम्मेदारी
मौजूदा समय में तैनात आबकारी निरीक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि—
गोदाम का भौतिक सत्यापन
स्टॉक और बिक्री का दैनिक मिलान
बिल, परमिट और परिवहन पास की जांच
और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तत्काल रिपोर्टिंग
यदि गोदाम अभी भी संचालित है और फिर भी—
पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं हुई
या वर्तमान गतिविधियों पर निगरानी नहीं है
तो यह कर्तव्य में घोर लापरवाही मानी जाएगी।
茶 उच्च अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
यह मामला केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है। जांच का दायरा अनिवार्य रूप से शामिल करे—
 तत्कालीन आबकारी आयुक्त
क्या उन्हें इस अनियमितता की जानकारी थी?
यदि थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
 वर्तमान आबकारी आयुक्त
पुराने मामलों की समीक्षा क्यों नहीं कराई गई?
चालू गोदाम पर विशेष ऑडिट क्यों नहीं?
 तत्कालीन प्रमुख सचिव (आबकारी)
क्या सिस्टम लेवल पर निगरानी विफल रही?
 वर्तमान प्रमुख सचिव
अब तक इस गंभीर मामले को संज्ञान में लेकर जांच क्यों नहीं बैठाई गई?
⚖️ क्या होनी चाहिए कार्रवाई?
इस पूरे प्रकरण में—
स्पेशल ऑडिट
विजिलेंस/ईओडब्ल्यू जांच
गोदाम और लाइसेंस की अस्थायी निलंबन
और जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय व आपराधिक कार्रवाई
अनिवार्य प्रतीत होती है।
 निष्कर्ष
यह मामला अब सिर्फ पुराने बिलों का नहीं, बल्कि—
आज भी संचालित एक संदिग्ध गोदाम,
विभागीय चुप्पी
और संभावित शराब तस्करी के नेटवर्क
का बन चुका है।
अब सवाल यह नहीं है कि गड़बड़ी हुई या नहीं,
सवाल यह है कि कब और किस स्तर तक जांच पहुंचेगी।

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