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महिलाएं बेचेंगी ‘चखना’, आबकारी विभाग का नया प्रयोग या नई मुसीबत?राजस्व बढ़ाने की तैयारी में सरकार, लेकिन सुरक्षा और छवि पर उठे गंभीर सवाल:


महिलाएं बेचेंगी ‘चखना’, आबकारी विभाग का नया प्रयोग या नई मुसीबत?
राजस्व बढ़ाने की तैयारी में सरकार, लेकिन सुरक्षा और छवि पर उठे गंभीर सवाल
लखनऊ/प्रदेश।
आबकारी विभाग द्वारा राजस्व बढ़ाने के लिए एक नया और चौंकाने वाला प्रयोग सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक अब शराब की दुकानों के बगल महिला स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से ‘चखना’ बिकवाने की तैयारी की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि योजना के तहत हर ग्राम पंचायत में ऐसी दुकान खोलने की बात कही जा रही है।
 महिला सुरक्षा पर बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि—
अगर शराब की दुकान के ठीक बगल में महिलाएं चखना बेचेंगी, तो शराबियों की बदसलूकी और उत्पात से उनकी सुरक्षा कौन करेगा?
ग्रामीण इलाकों में पहले से ही शराब दुकानों को लेकर विवाद, झगड़े और सामाजिक तनाव की शिकायतें आम हैं। ऐसे में महिलाओं को सीधे इस माहौल में उतारना उन्हें खतरे में डालने जैसा माना जा रहा है।
 सरकार की छवि पर असर?
सामाजिक संगठनों और जानकारों का कहना है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर यदि महिलाओं को शराब से जुड़े कारोबार के फ्रंट पर खड़ा किया गया, तो इससे
सरकार की नैतिक छवि
महिला सुरक्षा को लेकर किए गए दावे
और ‘नशामुक्त समाज’ की सोच
सब पर सवाल खड़े होंगे।
 वर्चुअल मीटिंग में हुआ खुलासा
यह मुद्दा तब सामने आया जब सूत्रों के अनुसार प्रमुख सचिव (आबकारी) ने एक वर्चुअल समीक्षा बैठक में राजस्व बढ़ाने के उपाय सुझाए। बैठक में यह भी चर्चा हुई कि
राजस्व में गिरावट के लिए प्रवर्तन इकाई (Enforcement Wing) को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
 प्रवर्तन पर जिम्मेदारी, लेकिन अधिकार शून्य!
यहां सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
जब प्रवर्तन इकाई को दुकानों में घुसकर निरीक्षण का अधिकार नहीं
जब होलसेल गोदामों में जाने और शराब की जांच का अधिकार नहीं
तो फिर केवल प्रवर्तन को जिम्मेदार ठहराने का मतलब क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम
“लाडले जिला आबकारी अधिकारियों को बचाने और जिम्मेदारी नीचे धकेलने का प्रयास”
हो सकता है।
 नीति या पर्दा?
प्रश्न यह भी उठ रहा है कि—
क्या यह योजना वास्तव में राजस्व बढ़ाने के लिए है?
या फिर अव्यवस्थाओं, तस्करी और निगरानी की विफलता पर पर्दा डालने का तरीका?
 अब जवाब चाहिए
अब सरकार और आबकारी विभाग को साफ-साफ बताना होगा कि—
महिला स्वयं सहायता समूहों की सुरक्षा की क्या व्यवस्था होगी?
क्या ग्राम पंचायत स्तर पर सामाजिक सहमति ली गई है?
प्रवर्तन को अधिकार कब मिलेंगे?
और क्या महिला सशक्तिकरण को शराब नीति से जोड़ना सही दिशा है?
क्योंकि सवाल सिर्फ राजस्व का नहीं, समाज और सुरक्षा का भी है।

एनसीआर के कई जिले राजस्व की दृष्टि से फिसड्डी जिलो में: फिर भी संबंधित जिला आबकारी अधिकारियों पर क्यों नहीं हो रही कार्रवाई

एनसीआर क्षेत्र में शामिल नोएडा, बिजनौर और मुरादाबाद जैसे जनपदों का रेवेन्यू इंडेक्स में टॉप-फाइव बॉटम में होना कोई सामान्य संयोग नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध इन जिलों में व्याप्त शराब तस्करी, मिलावट और खुलेआम ओवर-रेटिंग से जुड़ा माना जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इतनी गंभीर अनियमितताओं के बावजूद इन जनपदों के आबकारी अधिकारियों को न केवल कार्रवाई से बचाया गया, बल्कि उन्हें पूरा प्रशासनिक संरक्षण भी मिलता रहा। विशेष रूप से बिजनौर जनपद पर दिखाई देने वाली अतिरिक्त “मेहरबानी” कई सवाल खड़े करती है—क्या यह राजनीतिक प्रभाव का परिणाम है, विभागीय मिलीभगत का संकेत है, या फिर ऊपर तक फैले किसी संगठित नेटवर्क का हिस्सा? जब राजस्व नुकसान स्पष्ट है और शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तब भी संरक्षण बना रहना व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है

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