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मेरठ जोन में ईआईबी की कार्रवाई पर गहराता विवाद, चयनात्मक छापों और जवाबदेही के दोहरे मापदंडों पर उठे सवाल:



लखनऊ/मेरठ।
प्रदेश के एटा, कासगंज, बुलन्दशहर, मेरठ, गाजियाबाद और शाहजहांपुर जनपदों में आबकारी इंटेलिजेंस ब्यूरो (EIB) की हालिया सक्रियता को लेकर विभागीय और राजनीतिक गलियारों में असंतोष गहराता जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि ईआईबी की कार्रवाई ओवररेटिंग पर वास्तविक नियंत्रण स्थापित करने में अपेक्षाकृत कमजोर साबित हो रही है, जबकि इसका उपयोग कुछ चयनित अधिकारियों और जनपदों पर दबाव बनाने के लिए अधिक किया जा रहा है।
‘व्यक्तिगत राडार’ पर अधिकारी, सिस्टम से बाहर कार्रवाई के आरोप
विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ जिला आबकारी अधिकारी (DEO) प्रमुख सचिव के कथित “व्यक्तिगत राडार” पर हैं, जिस कारण उनके जनपदों में लगातार छापेमारी और जांच की जा रही है। वहीं, समान या उससे अधिक गंभीर शिकायतों वाले अन्य जनपदों में ईआईबी की सक्रियता न के बराबर है। यह स्थिति कार्रवाई की निष्पक्षता और पारदर्शिता दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि ईआईबी की कई कार्रवाइयों में न तो स्पष्ट मापदंड तय हैं और न ही यह सार्वजनिक किया जा रहा है कि किन आधारों पर किसी जनपद को “हाई रिस्क” या “लो रिस्क” श्रेणी में रखा गया।
कम राजस्व वाले जनपद, एक ही जोन – जिम्मेदारी किसकी?
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आ रहा है कि प्रदेश में जिन जनपदों का आबकारी राजस्व सबसे कम दर्ज किया गया है, उनमें से अधिकांश मेरठ जोन के अंतर्गत आते हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जोनल स्तर पर निगरानी और प्रबंधन की जिम्मेदारी किसकी है।
विभागीय जानकारों का कहना है कि मेरठ जोन के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी दिलीपमणि त्रिपाठी की भूमिका पर गंभीर समीक्षा होनी चाहिए थी। सूत्र इसे “जवाबदेही से बचने और नियंत्रण को केंद्रीकृत करने” की रणनीति बता रहे हैं।
जांच के घेरे में अधिकारी को दो-दो जोन का प्रभार क्यों?
सूत्रों का दावा है कि दिलीपमणि त्रिपाठी स्वयं स्टरलाइट ब्रुकेम डिस्टिलरी को 58 हजार लीटर ऑफलाइन इम्पोर्ट परमिट जारी किए जाने के मामले में जांच के दायरे में हैं। ऐसे में उनके पास मेरठ और लखनऊ दोनों संवेदनशील जोनों का संयुक्त ईआईबी प्रभार दिया जाना विभागीय नैतिकता और प्रशासनिक संतुलन पर सवाल खड़े करता है।
विभागीय हलकों में यह चर्चा आम है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध जांच लंबित है, तो सामान्यतः उसे जांच से जुड़े या निगरानी वाले पदों से दूर रखा जाता है। लेकिन इस मामले में ठीक उलटा निर्णय लिया गया।
ओवररेटिंग के बावजूद चार्जशीट क्यों नहीं?
सूत्रों का आरोप है कि मेरठ जोन में ओवररेटिंग की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों पर न तो ठोस विभागीय कार्रवाई हुई और न ही चार्जशीट जारी की गई। सवाल यह भी है कि यदि ईआईबी के पास पर्याप्त इनपुट और खुफिया जानकारी है, तो कार्रवाई केवल कुछ जनपदों तक सीमित क्यों है।
यह भी कहा जा रहा है कि मेरठ जोन में ईआईबी की कार्रवाई “सेलेक्टिव” रही है—कुछ दुकानों और लाइसेंसियों पर बार-बार छापे, जबकि अन्य को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
नोएडा-बिजनौर में चुप्पी क्यों?
नोएडा और बिजनौर जैसे उच्च राजस्व और संवेदनशील जनपदों में ईआईबी की कथित निष्क्रियता भी सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार, इन जनपदों में ओवररेटिंग और अन्य अनियमितताओं की शिकायतें होने के बावजूद कोई बड़ी ईआईबी कार्रवाई सामने नहीं आई।
विभागीय चर्चाओं में यह आरोप भी उभरकर आ रहा है कि इन जनपदों के कुछ अधिकारी प्रमुख सचिव और आबकारी आयुक्त के करीबी माने जाते हैं, जिसके कारण उन पर हाथ डालने से परहेज किया जा रहा है। हालांकि, विभाग की ओर से इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
मंत्री के स्तर पर भी अलग-अलग मापदंड?
इस पूरे प्रकरण में एक और अहम बिंदु यह है कि ओवररेटिंग के आरोप में निलंबित किए गए नोएडा के डीईओ सुबोध श्रीवास्तव के मामले में विभागीय मंत्री नितिन अग्रवाल द्वारा निलंबन आदेश जारी करने के बजाय केवल स्पष्टीकरण मांगा गया। इसे लेकर विभाग के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए भी अलग-अलग मानक अपनाए जा रहे हैं।
भरोसे की परीक्षा में ईआईबी
कुल मिलाकर, ईआईबी की कार्रवाई इस समय अपने उद्देश्य से अधिक अपने तरीकों को लेकर चर्चा में है। पारदर्शिता, निष्पक्षता और समानता जैसे मूल सिद्धांतों पर उठते ये सवाल न केवल विभाग की साख को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि आबकारी राजस्व प्रबंधन की पूरी प्रणाली को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।
फिलहाल, इन आरोपों पर न तो आबकारी विभाग, न ईआईबी और न ही संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। लेकिन सूत्रों का मानना है कि यदि इन मुद्दों पर स्पष्टता नहीं लाई गई, तो मामला जल्द ही उच्च स्तर की प्रशासनिक और राजनीतिक समीक्षा तक पहुंच सकता है।

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