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प्रयागराज आबकारी मुख्यालय की जमीन पर कब्जा, दीवार पर लगे बोर्ड ने खोली पोल—अधिवक्ता चैंबर की आड़ में अतिक्रमण:


प्रयागराज आबकारी मुख्यालय की जमीन पर कब्जा, दीवार पर लगे बोर्ड ने खोली पोल—अधिवक्ता चैंबर की आड़ में अतिक्रमण
प्रयागराज | विशेष रिपोर्ट
प्रयागराज स्थित आबकारी विभाग के मुख्यालय परिसर की बहुमूल्य सरकारी जमीन पर खुलेआम अतिक्रमण का मामला सामने आया है। सामने आई तस्वीरों में दीवार पर लगे बोर्ड ने पूरे प्रकरण की परतें खोल दी हैं। बोर्ड पर जिन लोगों के नाम अंकित हैं, वही इस सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे बताए जा रहे हैं।
स्थल पर लगे नीले बोर्ड पर स्पष्ट रूप से “अधिवक्ता चेम्बर (एडवोकेट)” लिखा है, जिसके नीचे निम्न नाम दर्ज हैं—
श्रीमती कमला जायसवाल
श्री सुशील कुमार कुशवाहा
श्री मनीष कुमार यादव
श्री विजयभान तिवारी
श्रीमती सोमनाथी
श्रीमती मंजुलानी
श्री राजन पाण्डेय
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह पूरी जमीन आबकारी विभाग की है, जिसकी कीमत करोड़ों रुपये में आंकी जा रही है। इसके बावजूद यहां पक्का निर्माण, लोहे का गेट, ताला, नामपट्ट और अन्य स्थायी ढांचे खड़े कर दिए गए हैं। यह सब किसी अस्थायी कब्जे का नहीं, बल्कि सुनियोजित अतिक्रमण का संकेत देता है।
मुख्यालय से अफसर हटे, भूमाफिया सक्रिय
बताया जा रहा है कि जब से प्रयागराज स्थित आबकारी मुख्यालय से अडिशनल कमिश्नर, कमिश्नर और कई अहम अनुभागों को लखनऊ के कथित अवैध कार्यालय में शिफ्ट किया गया है, तब से इस परिसर पर निगरानी लगभग खत्म हो गई। इसी का फायदा उठाकर भूमाफिया और कब्जाधारियों के हौसले बुलंद हो गए और सरकारी जमीन पर निजी चैंबर खड़े कर दिए गए।
अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इतने बड़े अतिक्रमण के बावजूद आबकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन साधे हुए हैं। न कोई नोटिस, न सीमांकन, न ही कब्जा हटाने की कार्रवाई। विभागीय उदासीनता को अब सीधी मिलीभगत के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बिना आंतरिक संरक्षण के इतनी कीमती सरकारी जमीन पर इस तरह का कब्जा संभव है?
सरकारी संपत्ति, निजी इस्तेमाल
यदि जमीन आबकारी विभाग के नाम दर्ज है, तो उस पर अधिवक्ता चैंबर के नाम से निजी बोर्ड लगना और ताला बंद गेट होना सीधे-सीधे सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग और कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। यह मामला न केवल विभागीय लापरवाही, बल्कि शासन की संपत्ति की सुरक्षा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन और आबकारी विभाग इस अतिक्रमण को लेकर कब जागता है, क्या नामजद कब्जाधारियों पर कार्रवाई होती है, या फिर करोड़ों की सरकारी जमीन यूं ही खामोशी की भेंट चढ़ती रहेगी। तस्वीरें और बोर्ड पर लिखे नाम फिलहाल पूरी कहानी खुद बयां कर रहे हैं।

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