
अंसल एपीआई प्रकरण: 15 दिन में रिपोर्ट देनी थी, महीनों बाद भी जांच गायब
लखनऊ।
अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा लखनऊ के सुल्तानपुर रोड स्थित हाईटेक टाउनशिप परियोजना में कथित अनियमितताओं को लेकर उत्तर प्रदेश शासन ने 15 अप्रैल 2025 को उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की थी। शासनादेश में स्पष्ट निर्देश था कि समिति 15 दिन के भीतर जांच आख्या/प्रस्ताव शासन को उपलब्ध कराएगी, लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बावजूद अब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।
किन बिंदुओं पर होनी थी जांच
शासनादेश के अनुसार समिति को निम्न बिंदुओं पर जांच करनी थी—
बिना स्वामित्व प्राप्त भूमि पर विकास कार्य किए जाने की स्थिति
ग्राम सभा, चक मार्ग, सरकारी भूमि पर हुए कथित अवैध विकास कार्य
बंधक भूमि के विक्रय और उसके मूल्यांकन की स्थिति
स्वीकृत टाउनशिप में अधूरे विकास कार्यों को पूरा करने की कार्ययोजना
योजना के अंतर्गत बिना स्वामित्व प्राप्त सरकारी भूमि के आवंटन और आवंटियों का विवरण
कंसोर्टियम सदस्यों की भूमि खरीद–फरोख्त का पूरा ब्यौरा
जांच समिति की संरचना पर भी सवाल
जांच के लिए गठित समिति में—
मंडलायुक्त, लखनऊ को अध्यक्ष
उपाध्यक्ष, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को सदस्य–संयोजक
जिलाधिकारी, नगर आयुक्त, स्टाम्प विभाग के वरिष्ठ अधिकारी सहित अन्य विभागों के अधिकारी सदस्य बनाए गए
यही वह बिंदु है जहां निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि LDA स्वयं इस पूरे प्रकरण में आरोपों के घेरे में है। ऐसे में उसी प्राधिकरण के शीर्ष अधिकारी को जांच समिति का संयोजक बनाना कई सवाल खड़े करता है।
15 दिन की समयसीमा सिर्फ कागजों में?
शासनादेश की बिंदु संख्या-3 में साफ लिखा है कि—
“समिति द्वारा जांच आख्या/प्रस्ताव 15 दिन के अन्दर शासन को उपलब्ध करायी जायेगी।”
लेकिन—
तय समय सीमा बीत चुकी
न रिपोर्ट सार्वजनिक
न ही शासन स्तर पर कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने आई
RTI में भी जानकारी नहीं
पीड़ितों और सामाजिक संगठनों द्वारा जब जांच रिपोर्ट को लेकर RTI लगाई गई तो—
आयुक्त स्तर पर सीधे जवाब देने के बजाय
आवेदन को LDA को स्थानांतरित कर दिया गया
LDA की ओर से भी जांच समिति की रिपोर्ट या निष्कर्षों पर कोई ठोस सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई
NCLT और FIR के बावजूद चुप्पी
यह वही मामला है जिसमें—
25 फरवरी 2025 को NCLT ने अंसल एपीआई को दिवालिया प्रक्रिया में जाने की अनुमति दी
सुशांत गोल्फ सिटी, लखनऊ में 150 से अधिक पीड़ितों की FIR दर्ज है
जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई, लेकिन कार्रवाई की गति बेहद धीमी है
सबसे बड़ा सवाल
जब शासन ने खुद उच्च स्तरीय समिति बनाई
स्पष्ट समय सीमा तय की
और जांच के बिंदु भी निर्धारित किए
तो फिर— रिपोर्ट कहां है?
क्या जांच को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है?
UPRERA और LDA की भूमिका पर चुप्पी क्यों?
शासनादेश में जहां परियोजना से जुड़ी हर परत की जांच की बात कही गई है, वहीं—
UPRERA की भूमिका
और LDA की जवाबदेही
अब भी किसी ठोस कार्रवाई के दायरे में आती नहीं दिख रही।
Zero Tolerance पर परीक्षा
मुख्यमंत्री द्वारा सदन में दिए गए आश्वासन के बाद यह मामला अब Zero Tolerance नीति की असली परीक्षा बन चुका है।
पीड़ितों की मांग है कि—
जांच रिपोर्ट तत्काल सार्वजनिक की जाए
निष्पक्ष एजेंसी से पुनः जांच हो
जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई तय की जाए
क्योंकि अगर जांच समितियां भी समय पर जवाब न दें, तो सिस्टम पर भरोसा कैसे बचेगा?
आख़िर कब होगी UP RERA चेयरमैन संजय भूसारेड्डी के कार्यों की जाँच?
आख़िर कब होगी UP RERA चेयरमैन संजय भूसारेड्डी के कार्यों की जाँच?
सरकारी दावों, मुख्यमंत्री के आश्वासन और ज़मीनी हकीकत के बीच फंसे 150 से अधिक पीड़ित
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में रियल एस्टेट नियमन की सबसे बड़ी संस्था UP RERA (उप्र रेरा) आज खुद सवालों के घेरे में है। चेयरमैन संजय भूसारेड्डी के कार्यकाल को लेकर उठ रहे गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच की पहल न होना, सरकार की “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
25 फरवरी 2025 को एनसीएलटी (NCLT) ने एक ऐतिहासिक आदेश में यह टिप्पणी करते हुए अंसल एपीआई लखनऊ के प्रमोटर को दिवालिया प्रक्रिया (IBC) में जाने की अनुमति दे दी कि UP RERA और लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की खुली छूट और कथित मिलीभगत के कारण हालात यहां तक पहुँचे। यह टिप्पणी महज़ कानूनी आदेश नहीं, बल्कि नियामक तंत्र पर सीधा आरोप है।
मुख्यमंत्री का आश्वासन, लेकिन ज़मीनी कार्रवाई शून्य
बायर ग्रुप समेत पीड़ित आवंटियों के शोर-शराबे और आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री ने सदन में स्पष्ट घोषणा की थी कि
हर आवंटी को उसका प्लॉट दिलाया जाएगा,
और दोषी चाहे पाताल लोक में छिपे हों, उन्हें खोजकर लाया जाएगा।
इसके बावजूद, सुशांत गोल्फ सिटी लखनऊ में करीब 150 पीड़ितों की FIR दर्ज होने के बाद भी
अंसल बंधुओं की कोई गिरफ्तारी नहीं,
और न ही किसी बड़े अफसर पर ठोस कार्रवाई दिखाई देती है।
सरकार द्वारा विवेचना क्राइम ब्रांच को सौंपे जाने के बावजूद जाँच
सीमित दायरे में,
और बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है।
जबकि क्राइम ब्रांच द्वारा अधिकांश पीड़ित खरीदारों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं।
जाँच समिति भी सवालों के घेरे में
20 मार्च 2025 को तत्कालीन आयुक्त लखनऊ—जो स्वयं LDA की अध्यक्ष भी हैं—को इस पूरे मामले की जाँच समिति का प्रमुख बना दिया गया।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही है कि
क्या LDA से जुड़े मामले की निष्पक्ष जाँच वही अधिकारी कर सकते हैं, जो स्वयं LDA के शीर्ष पद पर हैं?
सरकार द्वारा तय 15 दिन की अवधि बीत जाने के बाद भी
जाँच रिपोर्ट का कोई अता-पता नहीं,
और RTI में जानकारी माँगने पर भी गोलमोल रवैया अपनाया गया।
RTI आवेदन का जवाब स्वयं देने के बजाय
आयुक्त कार्यालय ने आवेदन LDA को स्थानांतरित कर दिया,
जहाँ से आज तक न तो समिति के किसी सदस्य का जवाब आया,
न ही जाँच की स्थिति स्पष्ट की गई।
अनरजिस्टर्ड परियोजनाओं में कैसे होती रहीं रजिस्ट्री?
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यह है कि
अनरजिस्टर्ड और अविकसित परियोजनाओं में रजिस्ट्रियाँ होती रहीं,
जबकि नियमों के अनुसार UP RERA और LDA की अनुमति के बिना यह संभव ही नहीं है।
तो सवाल उठता है—
क्या यह सब UP RERA और LDA की शह के बिना हो सकता था?
बड़े सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा
क्या मुख्यमंत्री का सदन में दिया गया आश्वासन सिर्फ़ बयान बनकर रह जाएगा?
UP RERA प्रमुख संजय भूसारेड्डी और LDA के तत्कालीन VC पर अब तक कोई जाँच क्यों नहीं?
क्या यही सरकार की घोषित Zero Tolerance Policy है?
पीड़ितों को न्याय कब मिलेगा—या वे केवल फाइलों और समितियों के बीच घूमते रहेंगे?
जब तक इन सवालों का ठोस और पारदर्शी जवाब नहीं मिलता, तब तक UP RERA की निष्पक्षता और सरकार की मंशा—दोनों संदेह के घेरे में बनी




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