
लखनऊ। आबकारी विभाग की ओर से शासन को भेजी गई नीति में कथित तौर पर बाद में जोड़ा गया “सुदृढ़ीकरण” संबंधी पैरा अब बड़े प्रशासनिक विवाद का कारण बन गया है। सूत्रों के अनुसार यह पैरा मूल प्रस्ताव का हिस्सा नहीं था, बल्कि प्रमुख सचिव स्तर से बिना कार्मिक विभाग की मंजूरी और बिना विभागीय मंत्री के अनुमोदन के जोड़ा गया।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि आबकारी विभाग ने शासन को जो नीति प्रस्ताव भेजा था, उसमें “विभागीय सुदृढ़ीकरण” से संबंधित कोई अलग पैरा शामिल नहीं था। किंतु बाद में प्रमुख सचिव द्वारा एक नया पैरा जोड़ा गया, जिसमें विभागीय संरचना और अधिकारों में बदलाव का उल्लेख किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह बताया जा रहा है कि:
सहायक आबकारी आयुक्त (AAC)
जिला आबकारी अधिकारी (DEO)
की वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि (ACR/APAR) दर्ज करने का अधिकार, जो अब तक आबकारी आयुक्त (कमिश्नर) के पास था, उसे हटाकर अन्य स्तर पर स्थानांतरित कर दिया गया।
सुदृढ़ीकरण पैरा में क्या लिखा है?
पैरा के विंदु संख्या 3 में वर्णित “सुदृढ़ीकरण” पैरा के अनुसार:
विभागीय कार्यों की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन का उल्लेख किया गया।
अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि प्रणाली में संशोधन का प्रावधान जोड़ा गया।
सहायक आबकारी आयुक्त और डीईओ की एसीआर प्रविष्टि की शक्तियां आयुक्त स्तर से हटाकर उच्च प्रशासनिक स्तर पर स्थानांतरित की गईं।
विभागीय अनुशासन और निगरानी को “मजबूत” करने के नाम पर नियंत्रण तंत्र में बदलाव किया गया।
मंत्री की मंजूरी क्यों जरूरी?
प्रशासनिक नियमों के अनुसार, विभागीय नीति में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक बदलाव
— विशेषकर सेवा शर्तों और गोपनीय प्रविष्टि जैसी संवेदनशील व्यवस्था में — विभागीय मंत्री के अनुमोदन के बिना नहीं किया जा सकता। साथ ही, यदि यह कार्मिक प्रबंधन से जुड़ा विषय है तो कार्मिक विभाग की सहमति भी आवश्यक मानी जाती है।
सूत्रों का दावा है कि:
इस पैरा को जोड़ने के लिए कार्मिक विभाग से औपचारिक अनुमति नहीं ली गई।
विभागीय मंत्री से भी इस संशोधन का अनुमोदन प्राप्त नहीं किया गया।
सवालों के घेरे में प्रमुख सचिव
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि मूल प्रस्ताव में यह पैरा शामिल नहीं था तो इसे किस अधिकार से जोड़ा गया?
क्या यह प्रशासनिक अतिक्रमण है?
क्या इससे विभागीय स्वायत्तता प्रभावित हुई है?
कमिश्नर की भूमिका हुई सीमित?
आबकारी आयुक्त के पास अब तक सहायक आबकारी आयुक्त और जिला आबकारी अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि दर्ज करने का अधिकार था। इसे हटाया जाना न केवल अधिकारों में कटौती माना जा रहा है, बल्कि विभागीय नियंत्रण संरचना में बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एसीआर/एपीएआर प्रविष्टि का अधिकार वरिष्ठतम विभागीय अधिकारी के पास होना प्रशासनिक संतुलन के लिए आवश्यक होता है। ऐसे में इस अधिकार का स्थानांतरण विभागीय कार्यप्रणाली पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
⚖️ अब आगे क्या?
मामला अब शासन स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। यदि यह सिद्ध होता है कि बिना वैधानिक प्रक्रिया के पैरा जोड़ा गया, तो यह न केवल प्रशासनिक शुचिता बल्कि सेवा नियमों के उल्लंघन का मामला भी बन सकता है।
फिलहाल, पूरे प्रकरण पर शासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन “सुदृढ़ीकरण” के नाम पर अधिकारों के पुनर्वितरण ने विभागीय हलकों में हलचल मचा दी है।





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