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आरटीआई में बड़ा खुलासा: टपरी शराब घोटाले की शपथपत्र पर शिकायत, SIT रिपोर्ट और 20 करोड़ के आरोप—फिर भी प्रमुख सचिव आबकारी खामोश:


आरटीआई में बड़ा खुलासा: शपथपत्र पर शिकायत, SIT रिपोर्ट और 20 करोड़ के आरोप—फिर भी प्रमुख सचिव आबकारी खामोश
उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग से जुड़ा एक गंभीर मामला आरटीआई के जरिए सामने आया है, जिसने शासन स्तर की जवाबदेही और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस नीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आरटीआई दस्तावेजों के अनुसार अवैध शराब परिवहन और तस्करी से जुड़े गंभीर आरोपों की शिकायत शपथपत्र (हलफनामा) के साथ सीधे प्रमुख सचिव आबकारी को की गई थी। इसके बावजूद प्रमुख सचिव स्तर से किसी भी ठोस कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।
क्या है पूरा मामला
आरटीआई में उल्लेख है कि 30 जून 2020 से 8 जनवरी 2021 के बीच को-ऑपरेटिव आसवनी टपरी (सहारनपुर) से बदायूं जनपद के गोदाम तक ट्रकों द्वारा अवैध डबल ट्रिप कर शराब का परिवहन किया गया। इस कथित अनियमितता से करीब 20 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का दावा किया गया है। मामले में SIT की संयुक्त जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है।
सबसे अहम बात यह है कि यह शिकायत शपथपत्र के साथ प्रमुख सचिव आबकारी को सौंपी गई, जिससे इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है।
आरटीआई में ‘खेल’ कैसे हुआ
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचना प्रमुख सचिव आबकारी कार्यालय (शासन स्तर) से मांगी गई थी, लेकिन जवाब आयुक्तालय स्तर से दिलवाए गए। न तो यह स्पष्ट किया गया कि शिकायत पर प्रमुख सचिव ने क्या निर्णय लिया, न ही यह बताया गया कि शासन स्तर पर कोई फाइल चली या नहीं।
आरटीआई के जवाबों में बार-बार—
“सूचना उपलब्ध नहीं है”
“सूचना अस्पष्ट है”
“धारा 8(1) के अंतर्गत आती है” जैसे उत्तर देकर मूल सवालों से बचने की कोशिश की गई।
शासन की भूमिका पर चुप्पी
आरटीआई में यह भी पूछा गया कि—
शपथपत्र पर की गई शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई?
SIT रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर क्या निर्णय लिया गया?
शासन को किस स्तर पर अवगत कराया गया?
इन सवालों पर प्रमुख सचिव कार्यालय की कोई सीधी प्रतिक्रिया रिकॉर्ड पर नहीं है। जवाब आयुक्तालय से देकर शासन स्तर की जिम्मेदारी को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।
जीरो टॉलरेंस नीति पर सवाल
मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत प्रमुख सचिव आबकारी को कार्रवाई की पूरी छूट दी गई है। यही वह अधिकारी हैं, जिन्होंने अपने कर्मचारियों के खिलाफ परिनिन्दा जैसे लघुदण्ड में अधिकरण  व हाई कोर्ट से खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती देने में संकोच नहीं किया।
लेकिन सवाल यह है कि—
जहां कर्मचारियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट तक जाने का साहस दिखाया गया, वहीं 20 करोड़ रुपये के कथित राजस्व नुकसान के आरोपों पर खामोशी क्यों?
राज्य सूचना आयोग तक पहुंचा मामला
आरटीआई से असंतुष्ट होकर आरटीआई एक्टिविस्ट अमित रॉय एडवोकेट ने इस पूरे प्रकरण को लेकर राज्य सूचना आयोग में अपील दायर कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सूचना जानबूझकर अधूरी दी गई और शासन स्तर को बचाने की कोशिश की गई। अमित सिंह का कहना है कि भ्रष्टाचार के विरोध में उनका संघर्ष जारी रहेगा और विधान मंडल के सामने प्रमुख सचिव द्वारा भ्रष्टाचारियों का संरक्षण देने की कथित भूमिका के खिलाफ धरने पर बैठने का ऐलान किया है।
निष्कर्ष
यह मामला अब केवल सूचना न देने तक सीमित नहीं है।
शपथपत्र, SIT रिपोर्ट और बड़े राजस्व नुकसान के आरोपों के बावजूद कार्रवाई का अभाव,
आरटीआई को आयुक्तालय स्तर पर सीमित करना,
और प्रमुख सचिव कार्यालय की चुप्पी—
इन सबने मिलकर इसे प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता का बड़ा सवाल बना दिया है।
अब निगाहें राज्य सूचना आयोग और शासन के अगले कदम पर टिकी हैं—कि क्या इस मामले में सच सामने आएगा या खामोशी ही जवाब बनी

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