
प्रमुख सचिव का दुकानों की संख्या बढ़ाने पर जोर, डीईओ परेशान
कम्पोजिट दुकानों का कॉन्सेप्ट फेल होने की आशंका, अनुज्ञपियों को होगा नुकसान
लखनऊ। आबकारी विभाग में दुकानों की संख्या बढ़ाने को लेकर चल रही कवायद ने अधिकारियों से लेकर अनुज्ञपियों तक की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में हुई वर्चुअल मीटिंग में प्रमुख सचिव आबकारी ने स्पष्ट रूप से दुकानों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया, लेकिन जमीनी हकीकत से जूझ रहे जिला आबकारी अधिकारी (डीईओ) इस प्रस्ताव को लेकर खासे परेशान नजर आए। मीटिंग के दौरान कमिश्नर आबकारी भी असहज दिखाई दिए।
सूत्रों के मुताबिक, बैठक का माहौल उस वक्त और गंभीर हो गया जब एक डीईओ ने साफ शब्दों में कहा—
“हमारे जनपद में दुकानों की संख्या बढ़ाने की कोई गुंजाइश नहीं है।”
डीईओ का तर्क था कि जनपद में पहले से ही दुकानों की संख्या जनसंख्या, क्षेत्रफल और बिक्री क्षमता के अनुपात में अधिक है। ऐसे में नई दुकानें खोलना न तो व्यावहारिक है और न ही राजस्व बढ़ाने का भरोसेमंद रास्ता।
डीईओ ने यह भी स्पष्ट किया कि दुकानों की संख्या बढ़ने से बिक्री का बंटवारा होगा, जिससे मौजूदा अनुज्ञपियों को सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। इसके साथ ही प्रशासनिक नियंत्रण भी कमजोर होगा और अवैध बिक्री की आशंका बढ़ सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब दुकानों की संख्या बढ़ानी ही है, तो फिर कम्पोजिट दुकानों का कॉन्सेप्ट आखिर किस लिए लाया गया था? कम्पोजिट दुकानें इस मंशा से शुरू की गई थीं कि एक ही स्थान पर सभी मदिरा उत्पाद उपलब्ध हों, निगरानी मजबूत रहे और अनावश्यक दुकानों की भरमार रोकी जा सके। लेकिन अब नीति में बदलाव के संकेत इस पूरे कॉन्सेप्ट को फेल करने की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि वर्चुअल मीटिंग के दौरान प्रमुख सचिव और कमिश्नर दोनों ही परेशान और दबाव में नजर आए। एक ओर राजस्व बढ़ाने का लक्ष्य है, तो दूसरी ओर डीईओ स्तर पर जमीनी सच्चाई, जिसे अनदेखा करना भविष्य में विभाग के लिए भारी पड़ सकता है।
अनुज्ञपियों के बीच भी इस प्रस्ताव को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि दुकानों की संख्या बढ़ाई गई तो निवेश की भरपाई मुश्किल हो जाएगी और कम्पोजिट दुकानों पर किया गया बड़ा खर्च व्यर्थ चला जाएगा।
कुल मिलाकर, आबकारी विभाग की यह कवायद नीति, प्रशासन और अनुज्ञपियों—तीनों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर रही है। अब देखना यह है कि सरकार जमीनी हालात को ध्यान में रखकर कोई संतुलित फैसला लेती है या फिर जल्दबाजी में लिया गया निर्णय कम्पोजिट दुकान नीति को इतिहास बना देगा।




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