📰 एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट
“आबकारी विभाग में वसूली का नेक्सस: छोटे अफसर से लेकर शीर्ष स्तर तक फैला भ्रष्टाचार”
📍 भूमिका
उत्तर प्रदेश का आबकारी विभाग सरकार की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया है। हर साल शराब और बीयर की दुकानों से हजारों करोड़ का राजस्व राज्य के खजाने में जाता है। लेकिन इसी विभाग की जड़ें भ्रष्टाचार और वसूली से सड़ी हुई हैं। एक ताज़ा शिकायत पत्र ने यह राज़ खोल दिया है कि वसूली का यह खेल केवल निचले स्तर पर तैनात इंस्पेक्टर और सिपाही तक सीमित नहीं, बल्कि इसका संरक्षण शासन स्तर तक है।
📜 शिकायत से खुलासा
विभाग के लाइसेंसी ठेकेदार राकेश कुमार सिंह ने 19 अगस्त को आबकारी आयुक्त प्रयागराज को पत्र भेजकर बड़ा खुलासा किया। इस पत्र में उन्होंने साफ तौर पर आरोप लगाया कि—
- इंस्पेक्टर आदित्य सिंह दुकानदारों और आपूर्तिकर्ताओं से अवैध वसूली करते हैं।
- उनके खिलाफ शिकायत पर न तो कार्रवाई हुई, बल्कि उल्टा दबाव डालकर बयान बदलवाने और सबूत मिटाने की कोशिश की गई।
- जांच अधिकारी ने रिपोर्ट में सच दबा दिया और ऑडियो साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर लीपापोती की गई।
🧩 संरक्षण की पूरी श्रृंखला
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात है कि इंस्पेक्टर को निचले स्तर से लेकर शीर्ष स्तर तक अफसरों का संरक्षण हासिल है—
- आदित्य सिंह (इंस्पेक्टर) → सीधे संरक्षण में जिला आबकारी अधिकारी विष्णु प्रताप सिंह
- प्रदीप दुबे → प्रदीप दुबे पर शिकायत कर्ता का आरोप है कि वह आरोपी इंस्पेक्टर आदित्य सिंह को जांच से बचाने के लिए शिकायत कर्ता पर ही समझौते का दबाव बना रहे हैं। चूंकि डिप्टी कमिश्नर प्रदीप दुबे कमिश्नर आदर्श सिंह और प्रमुख सचिव के कृपा पात्र हैं इसलिए वसूली का ऑडियो रिकॉर्ड होने के बावजूद वसूली के आरोपी इंस्पेक्टर को बचाया जा रहा है। ऊपर तक मामला दबाने में समर्थक आबकारी आयुक्त आदर्श सिंह ने प्रकरण संज्ञान में होने के बाद भी कोई कार्रवाई नही की।
- और अंततः यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि वसूली का यह नेटवर्क प्रदीप दुबे के संरक्षण में चल रहा है और प्रदीप दुबे का खुला संरक्षण प्रमुख सचिव कर रही है।,
यानी, इंस्पेक्टर स्तर की वसूली का खेल सीधा सचिवालय तक पहुंचता है।
💰 वसूली का मॉडल
जांच में सामने आया पैटर्न बताता है कि यह एक “संगठित वसूली तंत्र” है:
- सिपाही और इंस्पेक्टर दुकानदारों व आपूर्तिकर्ताओं से वसूली करते हैं।
- रकम को “सुरक्षित” पहुंचाने का जिम्मा डिप्टी कमिश्नर प्रदीप दुबे संभालते हैं।
- चूंकि वसूली प्रकरण संज्ञान में होने के बावजूद अभी तक आरोपी इंस्पेक्टर पर कार्रवाई नही की गई इसलिए माना जा रहा है कि वसूली कमिश्नर और प्रमुख सचिव की जानकारी में हो रही है।
⚠️ क्यों घिरे बड़े अफसर?
- इंस्पेक्टर की लिखित शिकायत पर किसी भी स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई।
- शिकायत को उल्टा झूठा साबित करने की कवायद शुरू कर दी गई।
- इससे यह स्पष्ट होता है कि विभागीय अफसर न केवल वसूली में संलिप्त हैं बल्कि जवाबदेही से बचने के लिए जांच को गुमराह भी कर रहे हैं।
🔎 जांच या लीपापोती?
शिकायतकर्ता ने दावा किया कि:
- उसका असली बयान दबाया गया।
- ऑडियो टेप से छेड़छाड़ की गई।
- गवाहों को चुप कराने का दबाव डाला गया।
यह सब साफ करता है कि विभाग निष्पक्ष जांच करने की बजाय अपने ही अफसरों को बचाने में जुटा है।
❓ अब उठते बड़े सवाल
- जब आरोप इतने गंभीर हैं, तो इंस्पेक्टर आदित्य सिंह पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- जिला आबकारी अधिकारी विष्णु प्रताप सिंह और डिप्टी कमिश्नर प्रदीप दुबे की भूमिका पर सरकार खामोश क्यों है?
- आबकारी आयुक्त आदर्श सिंह और प्रमुख सचिव वीना मीना ने शिकायत दबाने का काम क्यों किया?
- क्या यह साबित नहीं करता कि पूरा तंत्र ऊपर तक “साझेदारी” में काम कर रहा है?
⚡ नतीजा
वसूली का यह नेक्सस अब केवल विभागीय भ्रष्टाचार का मामला नहीं रहा, बल्कि यह सरकार की छवि और साख पर सीधा प्रहार है। अगर शासन स्तर से कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साबित होगा कि सरकार भी इस वसूली तंत्र की मौन भागीदार है।

👉 आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव इस पूरे खेल पर तुरंत और पारदर्शी कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों और बैठकों में दबकर रह जाता है।

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