
लखनऊ।
प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त शासन के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ज़ीरो टॉलरेंस नीति के बावजूद आबकारी विभाग के हालात लगातार सवालों के घेरे में हैं। हाल के दिनों में एंटी करप्शन ब्यूरो की लगातार छापेमारी और रंगे हाथ गिरफ्तारियां इस बात का सबूत हैं कि विभाग के भीतर रिश्वतखोरी किस तरह जड़ें जमा चुकी है। वहीं, दूसरी ओर ईआईबी (एक्साइज इंटेलिजेंस ब्यूरो) जो कि जॉइंट एक्साइज कमिश्नर दिलीप मणि त्रिपाठी की अगुवाई में काम कर रहा है, पूरी तरह निष्क्रिय बना हुआ है।
प्रयागराज में गिरफ्तारी
एंटी करप्शन टीम ने प्रयागराज में उप आबकारी आयुक्त राजेंद्र शर्मा के कार्यालय के लिपिक रामकुमार सोनकर को ₹13,000 की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा। यह रकम दुकानों की लॉटरी की जमानत राशि लौटाने के नाम पर वसूली जा रही थी। गंभीर सवाल यह है कि बिना डिप्टी एक्साइज कमिश्नर राजेंद्र शर्मा और जिला आबकारी अधिकारी सुशील कुमार मिश्रा की मिलीभगत के यह अवैध वसूली कैसे संभव थी? सुशील कुमार मिश्रा पहले से ही बदायूं में टपरी अश्विनी घोटाले में आरोपित रहे हैं।
सहारनपुर में रिश्वतखोरी
सहारनपुर में भी एंटी करप्शन ने आबकारी निरीक्षक को रिश्वत लेते पकड़ा। यहां भी मामला दुकानों की लॉटरी की जमानत राशि से जुड़ा था। सवाल यह है कि जिला आबकारी अधिकारी की मौन सहमति के बिना यह वसूली संभव थी क्या? फिर भी किसी बड़े अफसर पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
महोबा का वायरल वीडियो
महोबा में जिला आबकारी अधिकारी का रिश्वत मांगते हुए वीडियो वायरल हुआ। भारी दबाव और विभागीय मंत्री नितिन अग्रवाल की पहल पर दस दिन की देरी से निलंबन की कार्रवाई हुई।
बनारस में चरित्र हनन का आरोप
एक महिला सिपाही ने वाराणसी के उप आबकारी आयुक्त पर चरित्र से जुड़े गंभीर आरोप लगाए। लेकिन विभाग की प्रमुख सचिव और शीर्ष अधिकारी इस मामले में भी चुप्पी साधे बैठे रहे। अंततः माननीय हाईकोर्ट ने आबकारी आयुक्त को तलब कर विभाग की फजीहत कराई।
मंत्री बनाम अफसरशाही
आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल भ्रष्टाचारमुक्त और पारदर्शी व्यवस्था के पक्षधर हैं। वे शराब की ओवररेटिंग, तस्करी और विभाग में फैले भ्रष्टाचार पर अभियान चला रहे हैं। लेकिन विभागीय प्रमुख सचिव और आबकारी आयुक्त की मिलीभगत से भ्रष्ट अधिकारियों को पदोन्नति मिल रही है, चार्जशीट दबाई जा रही है और शराब माफियाओं को खुला संरक्षण दिया जा रहा है।
एंटी करप्शन बनाम ईआईबी
जहां पुलिस की एंटी करप्शन टीम सक्रिय होकर भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर रही है, वहीं ईआईबी (दिलीप मणि त्रिपाठी के नेतृत्व में) पूरी तरह निष्क्रिय है। यही वजह है कि शराब माफिया इसका फायदा उठाकर और मजबूत हो रहे हैं।
बड़ा सवाल
क्या विभागीय प्रमुख सचिव और निष्क्रिय ईआईबी के कारण आबकारी विभाग में फिर किसी नए “टपरी घोटाले” की नींव रखी जा रही है?
यह सवाल अब सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विभागीय मंत्री नितिन अग्रवाल के संज्ञान का है।




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