
उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग में चल रहे कथित करोड़ों के खेल पर SIT रिपोर्ट ने ऐसा खुलासा किया है, जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर यह आरोप तेज़ हो गया है कि विभाग के प्रमुख सचिव और आबकारी आयुक्त खुद ही आरोपियों को बचाने में जुटे हैं।
“कार्रवाई नहीं, बचाव” — रिपोर्ट से उठे सीधे सवाल
SIT रिपोर्ट में साफ तौर पर कई जिलों में अवैध शराब बिक्री, राजस्व हानि और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि:
जिन अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, उन्हें बचाया जा रहा है
और जिन पर कार्रवाई हुई, वे ही बलि का बकरा बने नजर आ रहे हैं
⚠️ नाम जिन पर सबसे ज्यादा सवाल
इस पूरे मामले में जिन अधिकारियों को बचाने की कोशिश के आरोप हैं:
बदायूं के तत्कालीन जिला आबकारी अधिकारी सुशील मिश्रा
जौनपुर के तत्कालीन जिला आबकारी अधिकारी घनश्याम मिश्रा
वाराणसी के तत्कालीन डिप्टी एक्साइज कमिश्नर दिलीप मणि त्रिपाठी
आरोप है कि इन तीनों को बचाने के लिए ऊपर से दबाव और सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
50 करोड़ का खेल — और फिर ‘इनाम’!
सबसे बड़ा और सनसनीखेज आरोप बदायूं से जुड़ा है:
सुशील मिश्रा के कार्यकाल में
50 करोड़ रुपये से ज्यादा की शराब अवैध तरीके से बेची गई
विभाग को भारी राजस्व नुकसान हुआ
SIT रिपोर्ट में इस पर कार्रवाई की सिफारिश की गई
❗ लेकिन हुआ क्या?
कोई ठोस कार्रवाई नहीं
उल्टा उन्हें लखनऊ का पहला जिला आबकारी अधिकारी बनाया गया
फिर प्रयागराज में पोस्टिंग दे दी गई
सवाल: क्या यह सजा है या इनाम?
एक तरफ जेल, दूसरी तरफ प्रमोशन
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है:
डिप्टी एक्साइज कमिश्नर राकेश चतुर्वेदी → जेल भेजे गए
डिप्टी एक्साइज कमिश्नर राजशेखर उपाध्याय → चार्जशीट
लेकिन…
समान आरोपों में घिरे दूसरे अधिकारी बचाए जा रहे हैं
कुछ को तो पुरस्कृत कर दिया गया
茶 जौनपुर और वाराणसी कनेक्शन
जौनपुर में करोड़ों की अवैध शराब बिक्री के आरोप
उस समय जिम्मेदारी संभाल रहे घनश्याम मिश्रा
वाराणसी के डिप्टी एक्साइज कमिश्नर दिलीप मणि त्रिपाठी के पर्यवेक्षण क्षेत्र में ये सब हुआ
❗ फिर भी:
कोई ठोस कार्रवाई नहीं
घनश्याम मिश्रा को श्रावस्ती में पोस्टिंग
क्या यह “सिस्टम की सेटिंग” का उदाहरण है?
️♂️ ED जांच के बीच भी ‘ढाल’ क्यों?
मामला और गंभीर इसलिए:
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच जारी
स्टेटस रिपोर्ट मांगी जा चुकी
इसके बावजूद विभागीय स्तर पर सख्ती नहीं, बल्कि संरक्षण दिखाई दे रहा है
गोपनीय पत्र ने बढ़ाया शक
शासन के एक गोपनीय पत्र ने इस पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है।
आरोप:
प्रमुख सचिव और आबकारी आयुक्त खुद ही एक “सिक्योरिटी डोम” बन गए हैं,
जहां भ्रष्ट अधिकारियों को बचाया जा रहा है।
️ विधानसभा तक गूंज — जवाब अब तक गायब
यह मुद्दा विधानसभा में भी पहुंच चुका है।
समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने मामला उठाया,
लेकिन अब तक सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं आया।
बड़ा सवाल — सिस्टम या सिंडिकेट?
SIT रिपोर्ट, ED जांच, विधानसभा में उठे सवाल और संदिग्ध पोस्टिंग्स…
ये सब मिलकर एक ही सवाल खड़ा करते हैं:
क्या आबकारी विभाग में एक “सिस्टम” नहीं, बल्कि “सिंडिकेट” काम कर रहा है?
जहां ईमानदार कार्रवाई की जगह “मैनेजमेंट” और “सेटिंग” चल रही है?
⚡ निष्कर्ष (सीधा और कड़ा)
अगर SIT रिपोर्ट के बावजूद:
दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती
और उन्हें पदोन्नति/पोस्टिंग मिलती है
तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं,
बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
यह मामला अब सिर्फ जांच का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है।




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