
जब देश आर्थिक अनुशासन, डीजल-पेट्रोल बचत और सरकारी फिजूलखर्ची रोकने की बात कर रहा है, तब उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद सीमित काफिले के साथ चलने का संदेश दे रहे हैं, मुख्यमंत्री स्तर पर भी सरकारी फ्लीट और खर्चों में कटौती की जा रही है, वहीं दूसरी ओर आबकारी विभाग में कथित तौर पर “कैंप कार्यालय संस्कृति” अय्याशी का अड्डा बनती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक प्रयागराज स्थित मुख्यालय छोड़कर विभाग के कई महत्वपूर्ण अनुभाग लखनऊ के कथित किराए के कैंप कार्यालय से संचालित किए जा रहे हैं। आरोप है कि यह कैंप कार्यालय विभाग पर करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ बन चुका है।
रोज़ फाइलें ढो रही गाड़ियां, जनता का पैसा हो रहा बर्बाद?
बताया जा रहा है कि प्रतिदिन एक इनोवा प्रयागराज मुख्यालय से फाइलें लेकर लखनऊ जाती है और दूसरी गाड़ी लखनऊ से प्रयागराज आती है।
केवल वाहनों, डीजल और आवागमन पर ही प्रतिदिन ₹20 हजार से अधिक खर्च होने का आरोप है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब विभाग का स्थायी मुख्यालय प्रयागराज में मौजूद है तो आखिर महत्वपूर्ण अधिकारी और अनुभाग किराए के भवन से क्यों चलाए जा रहे हैं?
करोड़ों का किराया बकाया, फिर भी कैंप कार्यालय जारी!
सूत्रों का दावा है कि लखनऊ स्थित कथित कैंप कार्यालय का किराया करोड़ों रुपये तक बकाया है। इसके बावजूद विभाग के कई अहम अनुभाग वहीं से संचालित किए जा रहे हैं।
टास्क फोर्स, टेक्निकल, स्टैटिस्टिक्स, उत्पादन, लाइसेंस और कई अन्य शाखाओं के प्रयागराज मुख्यालय छोड़कर लखनऊ से संचालन पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजस्व लक्ष्य अधूरा, लेकिन खर्चे बेलगाम
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आबकारी विभाग अपना राजस्व लक्ष्य तक हासिल नहीं कर पा रहा, तब आखिर करोड़ों रुपये किराए, डीजल, जनरेटर और वीआईपी व्यवस्था पर क्यों खर्च किए जा रहे हैं?
सूत्रों के अनुसार लखनऊ कैंप कार्यालय में जनरेटर और डीजल खर्चों को लेकर भी गंभीर अनियमितताओं की चर्चा है।
क्या नियमों के खिलाफ चल रहा संचालन?
आरोप यह भी हैं कि जिन कार्यालयों का संचालन प्रयागराज मुख्यालय से होना चाहिए, वे कथित तौर पर अवैध रूप से लखनऊ के किराए के भवन से संचालित किए जा रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यह है—
जब सरकार खुद मितव्ययिता का संदेश दे रही है, तब क्या आबकारी विभाग में बैठे अधिकारी सरकारी खजाने को निजी सुविधा का साधन बना चुके हैं?
अगर आरोप सही हैं, तो करोड़ों रुपये के इस खर्च और कैंप कार्यालय व्यवस्था की उच्च स्तरीय जांच जरूरी हो गई है।
किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी?
अगर आरोप सही हैं तो किन अधिकारियों पर बन सकती है कार्रवाई
आबकारी विभाग के प्रयागराज मुख्यालय को छोड़कर लखनऊ के कथित कैंप कार्यालय से संचालन और करोड़ों रुपये की फिजूलखर्ची के आरोप केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि वित्तीय जवाबदेही का भी बड़ा मामला बन सकते हैं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी तय होती है और नियमों की अनदेखी पर किनके खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है?
1. उत्पादन आयुक्त / Excise Commissioner
विभाग का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते पूरे विभागीय संचालन, मुख्यालय व्यवस्था, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक नियंत्रण की जिम्मेदारी उत्पादन आयुक्त की मानी जाती है।
यदि मुख्यालय से बाहर अवैध या अनियमित संचालन, अनावश्यक कैंप कार्यालय, फिजूल वाहन खर्च और राजस्व हानि के आरोप सही पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ—
- विभागीय जांच
- वित्तीय अनियमितता की जांच
- शासन स्तर पर स्पष्टीकरण तलब
- सीएजी या विजिलेंस जांच की संस्तुति
जैसी कार्रवाई संभव मानी जा रही है।
2. एडिशनल कमिश्नर
एडिशनल कमिश्नर का दायित्व विभागीय अनुभागों की निगरानी, प्रशासनिक समन्वय और नियमों के अनुसार कार्यालय संचालन सुनिश्चित करना होता है।
यदि उनके स्तर पर प्रयागराज मुख्यालय छोड़कर लखनऊ में अनधिकृत संचालन हुआ है, तो—
- कर्तव्य में लापरवाही
- वित्तीय अनुशासन भंग
- सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग
के आरोपों में विभागीय कार्रवाई हो सकती है।
3. टास्क फोर्स / टेक्निकल / स्टैटिस्टिक्स अनुभाग के अधिकारी
इन अनुभागों की जिम्मेदारी राजस्व निगरानी, डेटा प्रबंधन, प्रवर्तन और तकनीकी संचालन की होती है।
यदि कार्यालय संचालन नियमों के विपरीत किया गया या अनावश्यक वाहन/डीजल खर्च कराया गया, तो संबंधित अधिकारियों पर—
- जवाबदेही तय
- खर्चों का ऑडिट
- रिकवरी
- प्रतिकूल प्रविष्टि
जैसी कार्रवाई संभव हो सकती है।
4. वित्त एवं लेखा अधिकारी
किराया, डीजल, वाहन और जनरेटर बिलों का भुगतान वित्तीय स्वीकृति के बिना संभव नहीं होता। ऐसे में यदि फर्जी, अनियमित या बिना आवश्यकता के खर्च स्वीकृत हुए हैं तो लेखा शाखा की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।
इन पर—
- वित्तीय अनियमितता
- गलत भुगतान
- सरकारी धन के दुरुपयोग
के आरोपों में कार्रवाई संभव मानी जा रही है।
क्या हो सकती है बड़ी जांच?
यदि शासन स्तर पर मामले को गंभीरता से लिया जाता है तो—
- विजिलेंस जांच
- विशेष ऑडिट
- सीएजी परीक्षण
- शासन स्तरीय जांच समिति
- जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर रिकवरी
जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार खुद सादगी और खर्चों में कटौती का संदेश दे रही है, तब क्या विभागीय अफसर सरकारी धन को निजी सुविधा की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं?




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