
आबकारी विभाग का नया सर्कुलर विवादों में, “बड़ी डिस्टलरी को फायदा पहुंचाने की साजिश” के आरोप
प्रतापगढ़/लखनऊ:
उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग द्वारा जारी एक नए सर्कुलर को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। विभागीय पत्र (लेटर संख्या 131…) में ई-ट्रांजैक्शन, अग्रिम भुगतान (एडवांस) और इंडेंट प्रक्रिया को लेकर दिए गए निर्देशों ने छोटे कारोबारियों और डिस्टलरी संचालकों में नाराजगी पैदा कर दी है।
सर्कुलर के अनुसार अब सप्लाई और भुगतान से जुड़ी प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और एडवांस आधारित किया गया है। यानी लाइसेंसधारकों को पहले से भुगतान (Advance Payment) करना होगा, उसके बाद ही माल की आपूर्ति संभव होगी। विभाग ने इसे पारदर्शिता और नियंत्रण बढ़ाने की पहल बताया है।
लेकिन इस फैसले को लेकर अंदरखाने बड़ा विवाद सामने आ रहा है। सूत्रों का दावा है कि यह सर्कुलर प्रदेश की कुछ बड़ी डिस्टलरी को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचाने के लिए जारी किया गया है। आरोप है कि कम पूंजी वाली कई डिस्टलरी अब तक उधार (क्रेडिट) पर माल बेचकर अपना व्यवसाय चलाती थीं, लेकिन इस नई व्यवस्था ने उनके लिए रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं।
चर्चा यह भी है कि यह पूरा मामला “कॉम्प्रोमाइज कमिश्नर” के खेल का हिस्सा है। सूत्रों के मुताबिक आबकारी नीति आने से पहले कुछ बड़ी डिस्टलरी और विभाग के शीर्ष अधिकारियों के बीच मुलाकातें हुई थीं, जिसके बाद इस तरह का क्लॉज चुपचाप जोड़ दिया गया। जबकि मौजूदा आबकारी पॉलिसी में एडवांस इंडेंट का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं बताया जा रहा।
इस सर्कुलर से दो बड़े फायदे बताए जा रहे हैं—
पहला, आबकारी विभाग को एक महीने का एडवांस भुगतान पहले ही मिल जाता है, जिसे विभाग अपनी आय (Revenue) के रूप में दिखा सकता है।
दूसरा, छोटी और उधारी पर काम करने वाली डिस्टलरी बाजार से बाहर हो जाती हैं, जिससे बड़ी पूंजी वाली डिस्टलरी का एकाधिकार (Monopoly) मजबूत होता है।
विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि एडवांस इंडेंट की व्यवस्था वास्तव में कुछ बड़ी कंपनियों और नीति निर्धारकों के बीच हुई सौदेबाजी का नतीजा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर आबकारी विभाग ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
अब देखना यह होगा कि इस सर्कुलर पर उठ रहे सवालों के बीच सरकार और विभाग क्या स्पष्टीकरण देते हैं, और क्या छोटे कारोबारियों को कोई राहत मिलती है या नहीं।




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