
Prayagraj. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आबकारी विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी राज शेखर उपाध्याय को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी विभागीय कार्यवाही और चार्जशीट के प्रभाव पर रोक लगा दी है। मामला सिविल सर्विस रेगुलेशन के अनुच्छेद 351-A के तहत शुरू की गई कार्रवाई से जुड़ा है। �
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High Court of Judicature at Allahabad में दाखिल रिट-ए संख्या 3479/2026 की सुनवाई न्यायमूर्ति Prakash Padia की अदालत में हुई। याचिकाकर्ता राज शेखर उपाध्याय ने 31 जनवरी 2026 को जारी कार्यालय आदेश और चार्जशीट को चुनौती दी थी। �
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याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अनुच्छेद 351-A के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए राज्यपाल की पूर्व अनुमति अनिवार्य है, जबकि इस मामले में केवल विभागीय मंत्री की स्वीकृति ली गई। कोर्ट के समक्ष दाखिल शॉर्ट काउंटर एफिडेविट में भी राज्यपाल की प्रत्यक्ष स्वीकृति का कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। �
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कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुच्छेद 351-A की भाषा स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि पेंशन रोकने या वसूलने का अधिकार केवल राज्यपाल के पास सुरक्षित है। आदेश में पूर्व के मामलों — Z.U. Ansari Vs. State of U.P., Smt. Sarita Yadav Vs. State of U.P. और Gaya Prasad Vs. State of U.P. — का भी उल्लेख किया गया, जिनमें यही सिद्धांत स्थापित किया गया था। �
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याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क रखा कि जिन घटनाओं को आधार बनाकर कार्रवाई की गई, वे 9 जनवरी 2021 से 12 फरवरी 2021 के बीच की हैं, जबकि चार्जशीट 31 जनवरी 2026 को जारी हुई, यानी चार वर्ष की वैधानिक सीमा के बाद। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस दलील को भी महत्वपूर्ण माना। �
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सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मामले में प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के पक्ष में मामला बनता हुआ मानते हुए 31 जनवरी 2026 के कार्यालय आदेश और चार्जशीट के प्रभाव एवं संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। साथ ही राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया गया है। �
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सूत्रों के अनुसार, राजशेखर उपाध्याय को राहत ऐसे समय मिली है जब आबकारी विभाग के शीर्ष स्तर पर पूरे मामले को लेकर गंभीर चर्चाएं चल रही हैं। विभागीय हलकों में चर्चा है कि आबकारी आयुक्त और प्रमुख सचिव स्तर से कार्मिक अनुभाग पर दबाव बनाया गया तथा अदालत में कमजोर काउंटर दाखिल किया गया। यह भी चर्चा है कि घटना के लगभग चार वर्ष बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया और अदालत के समक्ष ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे न्यायालय प्रथम दृष्टया संतुष्ट हो सके।
विभागीय चर्चाओं में तथाकथित “टपरी अवैध शराब कांड” भी फिर से सुर्खियों में है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि वर्तमान में Sushil Mishra, जो पूर्व में बदायूं में डीईओ रह चुके हैं, उनके कार्यकाल में बदायूं के CL-2 गोदाम में कथित रूप से करीब 100 ट्रक अवैध शराब रखी गई और बेची गई। विभागीय सूत्रों का दावा है कि शासन द्वारा गठित एसआईटी ने उनकी भूमिका को संदिग्ध मानते हुए कार्रवाई की सिफारिश की थी, लेकिन कार्रवाई के बजाय उन्हें पहले लखनऊ और बाद में प्रयागराज जैसे महत्वपूर्ण जिलों की जिम्मेदारी दे दी गई।
इसी तरह वर्तमान में Dilip Mani Tripathi का नाम भी चर्चाओं में बताया जा रहा है। आरोप हैं कि डिप्टी एक्साइज कमिश्नर वाराणसी रहते हुए जौनपुर में टपरी डिस्टिलरी की करोड़ों रुपये की शराब CL-2 के माध्यम से अवैध रूप से बिकवाई गई, जिससे विभाग को भारी राजस्व क्षति हुई। विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि वर्तमान प्रमुख सचिव की विशेष कृपा उनके ऊपर बनी हुई है।
आबकारी विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यदि राजशेखर उपाध्याय को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलती, तो भविष्य में इसी प्रकरण में अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता था। इसी वजह से विभाग के भीतर इस पूरे घटनाक्रम को कुछ लोग शीर्ष स्तर पर अपने करीबी अधिकारियों को बचाने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।




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