
अपने ही बुने जाल में फंसा आबकारी विभाग, वोकेशनल लाइसेंस से रेवेन्यू को बड़ा झटका
प्रयागराज/लखनऊ।
प्रदेश के आबकारी विभाग में एक बार फिर से बड़ी प्रशासनिक हलचल देखने को मिल रही है। विभाग के प्रमुख सचिव के फैसले अब उन्हीं के लिए मुश्किल खड़ी करते नजर आ रहे हैं। खासतौर पर वोकेशनल लाइसेंस नीति को लेकर उठे सवालों ने पूरे राजस्व तंत्र पर संकट खड़ा कर दिया है।
वोकेशनल लाइसेंस बना रेवेन्यू गिरावट की वजह
सूत्रों के अनुसार, वोकेशनल लाइसेंस के तहत जितनी शराब की खरीद दिखाई गई, उससे कहीं अधिक मात्रा में अवैध रूप से बिक्री होने के आरोप हैं। यानी कागजों में कम खरीद, लेकिन बाजार में दोगुनी बिक्री—जिससे सरकार के राजस्व को भारी नुकसान हुआ है। इस गड़बड़ी ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
60 हजार करोड़ के लक्ष्य पर संकट
वित्तीय वर्ष समाप्त होने में महज 12 दिन शेष हैं, जबकि सरकार ने करीब 60 हजार करोड़ रुपये के राजस्व लक्ष्य का निर्धारण किया था। मौजूदा हालात को देखते हुए यह लक्ष्य अब मुश्किल नजर आ रहा है। विभाग के अंदर भी इस बात को लेकर चिंता बढ़ गई है कि इतनी कम अवधि में लक्ष्य की भरपाई कैसे होगी।
समीक्षा बैठक में अधिकारियों पर गिरी गाज
आज हुई उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में प्रमुख सचिव ने बदायूं, संभल, मुरादाबाद और बागपत के जिला आबकारी अधिकारियों पर कड़ी नाराजगी जताई। बैठक में ही निलंबन का फरमान सुना दिया गया, जिससे विभाग में हड़कंप मच गया है।
निलंबन आदेश पर उठे कानूनी सवाल
हालांकि, प्रमुख सचिव का यह आदेश अब खुद विवादों में घिरता दिख रहा है। जानकारों का कहना है कि बिना किसी जांच, स्पष्टीकरण या आरोप पत्र के सीधे निलंबन की कार्रवाई नियमों के खिलाफ मानी जा सकती है। ऐसे में यह फैसला कानूनी पेच में फंस सकता है और आगे चलकर चुनौती भी दी जा सकती है।
चयनात्मक कार्रवाई पर भी सवाल
सूत्रों के मुताबिक, कुछ जिलों में गंभीर आरोपों के बावजूद अधिकारियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
बिजनौर के जिला आबकारी अधिकारी पर आरोप होने के बावजूद निलंबन नहीं हुआ।
नोएडा के अधिकारी पर ओवररेटिंग के आरोप लगे, लेकिन वहां भी कार्रवाई नहीं की गई।
इससे विभाग की कार्रवाई पर पक्षपात और चयनात्मक रवैये के आरोप लगने लगे हैं।
निष्कर्ष:
आबकारी विभाग इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रहा है—एक तरफ राजस्व लक्ष्य का दबाव और दूसरी ओर नीतिगत व प्रशासनिक फैसलों पर उठते सवाल। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस संकट से कैसे बाहर निकलता है और क्या पारदर्शिता के साथ कार्रवाई होती है या नहीं।




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