
Pryagraj: सूत्रों के मुताबिक एक कंपोजिट शराब की दुकान पर छापेमारी के दौरान नकली मदिरा बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री बरामद हुई, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर मामले में लाइसेंसी पर एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई। इस पूरे प्रकरण में डिप्टी आबकारी आयुक्त राजेंद्र शर्मा और जिला आबकारी अधिकारी सुशील मिश्रा की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
सूत्रों के अनुसार करछना क्षेत्र की भीरा कंपोजिट शॉप पर आबकारी विभाग की टीम ने छापेमारी की थी। कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर नकली शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाला कैरेमल और “आला” जैसी सामग्री बरामद हुई। आम तौर पर ऐसी सामग्री का उपयोग अवैध रूप से शराब के रंग और स्वाद को बदलने के लिए किया जाता है।
लाइसेंसी पर एफआईआर नहीं, कार्रवाई पर पर्दा क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि मौके से नकली मदिरा निर्माण से जुड़ी सामग्री बरामद हुई थी, तो फिर मामले में लाइसेंसी परएफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई। नियमों के अनुसार ऐसी बरामदगी होने पर संबंधित लाइसेंसी और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज कराया जाना चाहिए।
सूत्रों का कहना है कि छापेमारी की कार्रवाई डिप्टी आबकारी आयुक्त राजेंद्र शर्मा के संज्ञान में थी, जबकि जिले में प्रवर्तन से जुड़ी कार्रवाई की जिम्मेदारी जिला आबकारी अधिकारी सुशील मिश्रा के अधीन आती है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर मुकदमा दर्ज कराने की पहल क्यों नहीं हुई।
लाखों की कथित वसूली का आरोप
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब विभाग के ही एक सिपाही ने पूरे घटनाक्रम को लेकर प्रमुख सचिव को लिखित शिकायत भेज दी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कार्रवाई के बाद कथित तौर पर लाखों रुपये की वसूली की गई और रकम का बंदरबांट भी हुआ।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि अगर छापेमारी में इतनी गंभीर बरामदगी हुई थी तो कार्रवाई को आगे बढ़ाने के बजाय मामला दबाने की कोशिश क्यों की गई।
मीडिया से क्यों छुपाई गई कार्रवाई?
सूत्रों के मुताबिक इस पूरी कार्रवाई की जानकारी मीडिया से भी छुपाकर रखी गई। आमतौर पर जब आबकारी विभाग किसी अवैध शराब या नकली मदिरा से जुड़े मामले में छापेमारी करता है, तो उसकी जानकारी प्रेस नोट या ब्रीफिंग के जरिए सार्वजनिक की जाती है।
लेकिन करछना की इस कार्रवाई के मामले में ऐसा नहीं हुआ। न तो कोई आधिकारिक प्रेस नोट जारी किया गया और न ही बरामदगी की जानकारी सार्वजनिक की गई। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि आखिर कार्रवाई को गोपनीय रखने की जरूरत क्यों पड़ी।
कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा मामला
इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
अगर छापेमारी में नकली मदिरा से जुड़ी सामग्री मिली थी तो लाइसेंसी पर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई?
डिप्टी आबकारी आयुक्त राजेंद्र शर्मा के स्तर पर इस मामले में क्या निर्देश दिए गए?
जिला आबकारी अधिकारी सुशील मिश्रा ने लाइसेंसी और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई क्यों नहीं करवाई? जानकारी के मुताबिक सेल्समेन पर एफआईआर की कार्रवाई की गई जबकि लाइसेंसी को बचाने की अधिकारियों द्वारा कोशिश की गई।
कार्रवाई को मीडिया से क्यों छुपाया गया?
जांच की मांग तेज
सूत्रों का कहना है कि विभाग के अंदर से सामने आई शिकायत के बाद अब इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है। यदि निष्पक्ष जांच होती है तो करछना की इस कार्रवाई से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
फिलहाल विभागीय हलकों में इस मामले को लेकर चर्चाएं तेज हैं और अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन स्तर पर इस शिकायत के बाद क्या कार्रवाई होती है।




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