
लखनऊ में मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक में बीना मीना ने ओवर रेटिंग और राजस्व वसूली को लेकर कड़ा रुख अपनाया। बैठक के दौरान बागपत के जिला आबकारी अधिकारी नवीन सिंह को सख्त फटकार लगी, वहीं लखनऊ के डिप्टी एक्साइज कमिश्नर राकेश सिंह को को भी नाराजगी का सामना करना पड़ा।पूरे मंडल में राजस्व की कमी के लिए डिप्टी लखनऊ को जिम्मेदार मानते हुए उनसे कम राजस्व की रिकवरी का आदेश सुनाया गया।
अब इस पूरे प्रकरण में आबकारी विभाग और संबंधित जिला आबकारी अधिकारियों की भूमिका चर्चा के केंद्र में है।
जिला आबकारी अधिकारी क्यों निशाने पर?
ओवर रेटिंग की शिकायतों और कमजोर राजस्व वसूली के लिए सीधे तौर पर जिला आबकारी अधिकारी जिम्मेदार माने जाते हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब पचहत्तर जनपदों की समीक्षा में दस सबसे कमजोर जिलों की सूची सामने आई, तो सभी संबंधित जिला आबकारी अधिकारियों पर समान कार्रवाई क्यों नहीं दिखी?
बिजनौर का मामला चर्चा में
राजस्व प्रदर्शन में बेहद कमजोर स्थिति वाले जिलों में बिजनौर का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि जिला आबकारी अधिकारी का प्रदर्शन सूची में 74वें स्थान पर है। इसके बावजूद बैठक में उनके खिलाफ सार्वजनिक सख्ती नहीं दिखी, जिससे विभागीय गलियारों में पक्षपात की चर्चा तेज हो गई है।
दोहरे मापदंड का आरोप
सूत्रों का कहना है कि जिन अधिकारियों पर प्रमुख सचिव की नाराजगी होती है, उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणी और दबाव दिखता है, जबकि कुछ जिलों को अपेक्षाकृत राहत मिल जाती है। हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि—
क्या सभी जिला आबकारी अधिकारियों के लिए एक समान मानक तय हैं?
क्या ओवर रेटिंग और राजस्व लक्ष्य की समीक्षा पारदर्शी तरीके से हो रही है?
क्या कार्रवाई प्रदर्शन के आधार पर हो रही है या व्यक्तिगत समीकरण भी भूमिका निभा रहे हैं?
विभाग की चुप्पी
अब तक आबकारी विभाग की ओर से इस कथित असमानता पर कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। लेकिन यह मामला प्रशासनिक निष्पक्षता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।
ओवर रेटिंग पर सख्ती जरूरी है, लेकिन यदि जिला आबकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में पारदर्शिता नहीं दिखेगी, तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।




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