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गरीब पूर्वांचल कैसे बना शराब खपत का ‘हॉटस्पॉट’? तस्करी के खेल से बढ़ी खपत, समाजशास्त्री भी हैरान:


लखनऊ।
बिहार में शराबबंदी के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के सीमावर्ती जिलों में शराब की खपत ने चौंकाने वाला रूप ले लिया है। जिन जिलों को अब तक आर्थिक रूप से कमजोर माना जाता था, वही आज शराब बिक्री और आबकारी राजस्व के मामले में प्रदेश के समृद्ध इलाकों को पीछे छोड़ रहे हैं।
गरीबी के बावजूद खपत में उछाल, बड़ा सवाल
चर्चा है कि कुशीनगर, देवरिया, गाजीपुर और चंदौली जैसे जिले, जहां प्रति व्यक्ति आय कम है, वहां शराब की खपत मेरठ, अलीगढ़, बरेली, मथुरा और मुरादाबाद जैसे विकसित जिलों से भी ज्यादा दर्ज की जा रही है।
यह विरोधाभास अब बड़ा सवाल बन गया है—आखिर सीमित आय वाले इलाकों में इतनी ज्यादा खपत कैसे?
समाजशास्त्री भी हैरान
विनोद सिंह समेत कई समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह सामान्य सामाजिक-आर्थिक व्यवहार नहीं है। उनके अनुसार,
“किसी भी क्षेत्र में आय और खपत का सीधा संबंध होता है, लेकिन यहां जो ट्रेंड दिख रहा है, वह असामान्य है और इसके पीछे बाहरी कारणों की भूमिका साफ नजर आती है।”
सूत्रों के हवाले से: तस्करी ही असली वजह
सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि बिहार में शराबबंदी के चलते वहां के लोग यूपी से बड़े पैमाने पर शराब खरीद रहे हैं। सीमावर्ती जिलों की दुकानों से थोक में खरीदकर शराब को बिहार के गांवों तक पहुंचाया जा रहा है।
यानी इन जिलों की बढ़ी हुई खपत स्थानीय नहीं, बल्कि तस्करी की मांग को दर्शाती है।
आंकड़े भी दे रहे गवाही
वित्तीय वर्ष 2025-26 में बिहार सीमा से लगे जिलों ने आबकारी राजस्व में रिकॉर्ड योगदान दिया। बलिया और सोनभद्र ने 100% से ज्यादा लक्ष्य हासिल किया, जबकि अन्य जिलों ने भी 90% से अधिक वसूली की।
यह स्थिति तब है, जब पूरे प्रदेश का औसत प्रदर्शन इससे काफी कम रहा।
नदियां और सड़कें बनीं सप्लाई लाइन
गंडक, घाघरा और गंगा जैसी नदियां, साथ ही ट्रेन, बस और निजी वाहनों की लगातार आवाजाही तस्करी को आसान बना रही है। छोटे-छोटे हिस्सों में बड़ी मात्रा में शराब पार कराई जा रही है, जिससे पकड़ पाना मुश्किल हो रहा है।
खुलेआम थोक बिक्री की चर्चा
चर्चा है कि कई सीमावर्ती दुकानों पर बड़ी मात्रा में शराब बेची जा रही है और ग्राहकों की सख्ती से जांच नहीं होती। इससे यूपी और बिहार के खरीदारों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।
प्रशासन पर उठ रहे सवाल
इतनी असामान्य खपत और तस्करी के संकेतों के बावजूद निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। यदि सख्ती होती, तो गरीब जिलों में इतनी अधिक खपत संभव नहीं मानी जा रही।
निष्कर्ष:
पूर्वांचल के गरीब जिलों का अचानक शराब खपत में आगे निकलना केवल आर्थिक या सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़े तस्करी नेटवर्क की ओर इशारा करता है। यही वजह है कि इस पूरे ट्रेंड ने समाजशास्त्रियों से लेकर प्रशासन तक सभी को हैरान कर दिया है।
लखनऊ।
बिहार में लागू शराबबंदी का सीधा असर अब उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में साफ दिखाई दे रहा है। आबकारी विभाग की समीक्षा में सामने आया है कि इन जिलों में शराब की बिक्री और राजस्व में जबरदस्त उछाल आया है।
चर्चा है: कमजोर जिले, फिर भी खपत में सबसे आगे
चर्चा है कि बिहार से सटे जिले आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर होने के बावजूद शराब खपत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और NCR के समृद्ध जिलों से भी आगे निकल गए हैं।
सवाल उठ रहा है कि जब आय कम है तो खपत इतनी ज्यादा कैसे?
सूत्रों के हवाले से: तस्करी बना असली कारण
सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि यह बढ़ी हुई खपत स्थानीय उपभोग का नतीजा नहीं, बल्कि बिहार में हो रही तस्करी का सीधा असर है।
बिहार में शराबबंदी के कारण वहां के लोग यूपी से बड़े पैमाने पर शराब खरीदकर ले जा रहे हैं। यही वजह है कि सीमावर्ती जिलों की दुकानों पर थोक बिक्री बढ़ गई है और आबकारी राजस्व में अप्रत्याशित उछाल दर्ज हुआ है।
यानी साफ संकेत हैं कि तस्करी के जरिए ही इन जिलों का आबकारी खजाना भर रहा है और आंकड़े भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
राजस्व के आंकड़े दे रहे गवाही
वित्तीय वर्ष 2025-26 में बिहार से सटे छह जिलों ने आबकारी राजस्व में सबसे ज्यादा योगदान दिया। इनमें से पांच जिलों ने 90% से अधिक लक्ष्य हासिल किया, जबकि बलिया और सोनभद्र ने 100% से ज्यादा वसूली कर ली।
इसके अलावा गाजीपुर, चंदौली, कुशीनगर और देवरिया में भी बिक्री में तेज उछाल दर्ज किया गया।
समृद्ध जिलों को छोड़ा पीछे
चर्चा है कि कुशीनगर और देवरिया जैसे जिले अब मेरठ, अलीगढ़, बरेली, मथुरा और मुरादाबाद जैसे विकसित जिलों से भी ज्यादा खपत दर्ज कर रहे हैं। जबकि इनकी प्रति व्यक्ति आय काफी कम है—जो इस पूरे मामले को और संदिग्ध बनाता है।
खुलेआम थोक बिक्री, पहचान नहीं पूछी जाती
सूत्रों के मुताबिक सीमावर्ती क्षेत्रों में कई दुकानों पर बड़ी मात्रा में शराब बेची जा रही है और ग्राहकों की पहचान या गंतव्य की सख्ती से जांच नहीं होती। इससे तस्करी को बढ़ावा मिल रहा है।
नदियों से लेकर सड़कों तक तस्करी का जाल
यूपी-बिहार के बीच ट्रेनों, बसों और निजी वाहनों की आवाजाही के साथ-साथ गंडक, घाघरा और गंगा जैसी नदियां भी तस्करी का बड़ा माध्यम बनी हुई हैं। इन रास्तों से शराब की सप्लाई आसानी से की जा रही है।
विशेषज्ञ भी जता रहे आशंका
विनोद सिंह के अनुसार,
“एक राज्य में शराबबंदी होने पर पड़ोसी राज्यों में मांग बढ़ना स्वाभाविक है। मौजूदा हालात उसी का उदाहरण हैं।”
प्रशासनिक भूमिका पर सवाल
इतनी बड़ी मात्रा में बढ़ती खपत और तस्करी के बावजूद निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा है कि यदि सख्ती होती, तो यह उछाल इस स्तर तक नहीं पहुंचता।

बिहार की शराबबंदी ने जहां वहां के बाजार को सीमित किया, वहीं यूपी के सीमावर्ती जिलों में यह ‘कमाई का बड़ा जरिया’ बन गई है। चर्चा और सूत्रों के दावे इस ओर इशारा कर रहे हैं कि तस्करी का नेटवर्क ही इस पूरी कहानी की असली कड़ी है।

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