

प्रयागराज/भदोही।
जनपद भदोही में आबकारी विभाग इस समय प्रशासनिक मज़ाक बनकर रह गया है। जिला आबकारी अधिकारी (डीईओ) अरुण कुमार शुक्ला पर न सिर्फ ओवर रेटिंग और तस्करी को संरक्षण देने की लगातार शिकायतें आती रहीं, बल्कि डिप्टी कमिश्नर (उप आबकारी आयुक्त) मिर्जापुर की जांच रिपोर्ट और जिलाधिकारी भदोही की रिपोर्ट में भी उन्हें दोषी पाया गया। इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि — आखिर ऐसे अधिकारी को अब तक पद पर बनाए क्यों रखा गया है?
दो स्तर की जांच में दोषी, फिर भी कुर्सी सुरक्षित
सूत्रों के अनुसार,
डीईओ भदोही के विरुद्ध पहले जिलाधिकारी भदोही द्वारा गंभीर शिकायतें शासन को भेजी गईं। इन शिकायतों की पुष्टि के लिए मामला डिप्टी कमिश्नर/उप आबकारी आयुक्त, मिर्जापुर प्रभार को सौंपा गया। जांच के बाद जो रिपोर्ट सामने आई, उसमें—
शासनादेशों के उल्लंघन
प्रवर्तन कार्यों की अनदेखी
आबकारी सिपाहियों की मनमानी तैनाती
अवैध शराब पर प्रभावी नियंत्रण न होना
जैसे गंभीर तथ्य दर्ज पाए गए।
यही नहीं, इन रिपोर्टों के आधार पर स्वयं आबकारी आयुक्त, उत्तर प्रदेश को डीईओ अरुण कुमार शुक्ला से कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगना पड़ा।
ओवर रेटिंग और तस्करी की लगातार शिकायतें
भदोही में शराब के ठेकों पर ओवर रेटिंग,
अवैध शराब की खुलेआम बिक्री,
और तस्करी के नेटवर्क को लेकर लगातार शिकायतें आती रहीं।
स्थानीय स्तर से लेकर जिला प्रशासन तक यह मुद्दा बार-बार उठा, लेकिन—
ज़मीनी स्तर पर न सख्त कार्रवाई दिखी
न ही माफिया पर निर्णायक प्रहार
जांच रिपोर्ट में भी यह दर्ज है कि प्रवर्तन कमजोर रहा, जिसका सीधा लाभ अवैध कारोबारियों को मिला।
डीईओ की ‘गुंडागर्दी’ की शिकायतें, अफसरशाही भी असहज
विभागीय सूत्रों का दावा है कि डीईओ भदोही की कार्यशैली को लेकर सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि अधीनस्थ कर्मचारी और अन्य विभागीय अधिकारी भी असहज रहे।
मनमानी तैनाती, नियमों की अनदेखी और आदेशों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति को अधिकारी “प्रशासनिक गुंडागर्दी” करार दे रहे हैं।
जब आयुक्त खुद स्पष्टीकरण मांग रहे हैं, तो संरक्षण क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
जब डिप्टी कमिश्नर मिर्जापुर की जांच रिपोर्ट में दोष
जब जिलाधिकारी भदोही की जांच में दोष
और जब आबकारी आयुक्त स्वयं स्पष्टीकरण मांग चुके हैं
तो फिर डीईओ अरुण कुमार शुक्ला को
पद पर बनाए रखने का आधार क्या है?
क्या यह शासन की जीरो टॉलरेंस नीति के विपरीत नहीं है?
पूरा विभाग बना तमाशा
विभागीय हलकों में खुलकर कहा जा रहा है कि—
“जब जांच में दोषी पाए गए अधिकारी पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो संदेश यही जाता है कि नियम सिर्फ कागज़ों के लिए हैं।”
इस पूरे प्रकरण ने आबकारी विभाग की साख और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल बन चुका है।
अब कार्रवाई या फिर चुप्पी?
फिलहाल डीईओ भदोही से स्पष्टीकरण मांगा जा चुका है। लेकिन असली परीक्षा अब शासन और आबकारी आयुक्त की है—
क्या दोष सिद्ध होने के बावजूद कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?
जनता और विभाग दोनों की निगाहें अब इसी सवाल पर टिकी हैं।





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