
प्रतापगढ़।
गरुणा सेवा प्रदाता एजेंसी का टेंडर समाप्त हो जाने के बावजूद प्रतापगढ़ मेडिकल कॉलेज में उसी एजेंसी द्वारा कर्मचारियों की नियुक्ति और तैनाती का खेल जारी है। हैरानी की बात यह है कि मरीजों की संख्या सीमित होने के बावजूद कॉलेज में करीब एक हजार कर्मचारियों की तैनाती कर दी गई है, जिनमें से लगभग 600 कर्मचारी केवल एक ही एजेंसी के माध्यम से लगाए गए हैं। यह पूरा मामला अब नियमों की अनदेखी और संभावित वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा कर रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, टेंडर अवधि समाप्त होने के बाद न तो एजेंसी को औपचारिक रूप से हटाया गया और न ही नई एजेंसी के चयन की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके विपरीत, मेडिकल कॉलेज में लगातार नई नियुक्तियां की जाती रहीं और सरकारी मद से वेतन भुगतान भी होता रहा।
मरीज कम, कर्मचारी ज्यादा
स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि जब मेडिकल कॉलेज में मरीजों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, तो फिर आवश्यकता से कई गुना अधिक कर्मचारियों की तैनाती क्यों की गई। जानकारों का कहना है कि मानव संसाधन का ऐसा असंतुलन किसी प्रशासनिक चूक से कहीं आगे की कहानी बयां करता है।
इतनी तैनाती के बाद भी अव्यवस्था
चौंकाने वाली बात यह है कि भारी संख्या में कर्मचारियों की मौजूदगी के बावजूद मेडिकल कॉलेज में साफ-सफाई, मरीजों की देखभाल और कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। इससे यह संदेह और गहराता है कि तैनाती ज़मीनी ज़रूरत के बजाय कागज़ी औपचारिकता बनकर रह गई है।
प्रिंसिपल की भूमिका पर सवाल
पूरा प्रशासनिक नियंत्रण प्रिंसिपल के पास होने के कारण अब उनकी भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
टेंडर समाप्त होने की जानकारी के बावजूद नियुक्तियां कैसे चलती रहीं?
बिना वैध अनुबंध कर्मचारियों की तैनाती को किस स्तर पर अनुमति मिली?
वेतन भुगतान की फाइलों को किस आधार पर स्वीकृति दी गई?
इन सवालों के जवाब अब तक सामने नहीं आ पाए हैं।
क्या होनी चाहिए कार्रवाई
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में तत्काल
टेंडर समाप्ति के बाद की गई सभी नियुक्तियों पर रोक
पूरे प्रकरण की स्वतंत्र प्रशासनिक और वित्तीय जांच
नियमविरुद्ध भुगतान की स्थिति में रिकवरी
जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई
आवश्यक है।
फिलहाल, प्रतापगढ़ मेडिकल कॉलेज में चल रही यह नियुक्ति प्रक्रिया शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में चुप्पी तोड़ते हैं या फिर जांच के आदेश देकर जवाबदेही तय की जाती है।




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