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सुप्रीम कोर्ट से झटका, लेकिन सवाल बरकरार: क्या आबकारी विभाग आरोपी के आगे नतमस्तक?


कमज़ोर पैरवी, करीबी रिश्तों की चर्चा और फर्जीवाड़े के आरोप—मयूर आहूजा केस में विभाग की भूमिका पर गंभीर संदेह
खबर (इन्वेस्टिगेटिव स्टाइल):
नई दिल्ली/लखनऊ। अवैध शराब कांड में आबकारी विभाग की भूमिका अब खुद कठघरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें बदायूं के सील गोदाम को खोलने का निर्देश दिया गया था।
यानी साफ है—विभाग की कानूनी लड़ाई कमजोर पड़ी, और इसका सीधा फायदा आरोपी को मिला।
SIT जांच में क्या निकला?
सहारनपुर की टपरी कोऑपरेटिव डिस्टिलरी से अवैध शराब की निकासी…
और बदायूं, संभल, उन्नाव, जौनपुर के गोदामों से अवैध सप्लाई…
यह कोई छोटा मामला नहीं था। विशेष जांच टीम (SIT) ने कार्रवाई करते हुए बदायूं के गोदाम को सील किया—जिसका नाम जुड़ता है मयूर आहूजा से।
लेकिन सवाल यह है कि जब मामला इतना बड़ा था, तो अदालत में विभाग की पैरवी इतनी कमजोर क्यों रही?
कमज़ोर काउंटर या जानबूझकर ढील?
हाईकोर्ट में दाखिल किए गए काउंटर को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों का दावा है कि विभाग की ओर से जानबूझकर मजबूत पक्ष नहीं रखा गया—और यही वजह बनी कि गोदाम खोलने का आदेश देना पड़ा।
अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो वहां भी राहत नहीं मिली।
हालांकि, कोर्ट ने एक “लाइफलाइन” जरूर दी—नया नोटिस जारी कर कार्रवाई का विकल्प।
अधिकारियों और आरोपी के रिश्ते—सबसे बड़ा विवाद
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू—अधिकारियों और आरोपी के कथित संबंध।
एक संयुक्त आबकारी आयुक्त  पर सवाल
निजी विवाह समारोह में विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी
डिप्टी, लैब और अन्य अधिकारियों की भागीदारी
क्या यह महज संयोग है… या फिर “सिस्टमेटिक नेक्सस”?
पोस्टिंग और आउटसोर्सिंग में भी ‘दखल’ के आरोप
सूत्रों के मुताबिक—
विभाग में आउटसोर्सिंग के जरिए हो रही नियुक्तियों में भी मयूर आहूजा की भूमिका बताई जा रही है
कई रिटायर्ड अधिकारियों को दोबारा जगह मिलने के पीछे भी उसी का प्रभाव बताया जा रहा है
सबसे बड़ा नाम—एक पूर्व एडिशनल लाइसेंस
जिन्हें लेकर चर्चा है कि उनकी नियुक्ति में भी बाहरी प्रभाव रहा।
फर्जी पोर्टल और QR कोड—बड़ा घोटाला?
मामला यहीं नहीं रुकता…
एक कथित फर्जी आबकारी पोर्टल “मेंटॉर” के नाम से चलाया गया,
जिसके जरिए नकली QR कोड जारी किए गए।
अगर यह सही है, तो यह सिर्फ अवैध शराब का मामला नहीं—
बल्कि पूरे सिस्टम में सेंध का मामला बन जाता है।
अब क्या करेगा विभाग?
अब विभाग के पास बहाने नहीं, सिर्फ विकल्प हैं:
नया नोटिस जारी कर कड़ी कार्रवाई
लाइसेंस रिन्यूअल में अनियमितताओं के आधार पर निरस्तीकरण
लेकिन बड़ा सवाल—
क्या विभाग में इतनी इच्छाशक्ति बची है?
निष्कर्ष (तेज सवाल):
क्या कमज़ोर पैरवी एक गलती थी… या सुनियोजित रणनीति?
क्या आरोपी और अधिकारियों के रिश्ते कार्रवाई में बाधा बन रहे हैं?
और सबसे बड़ा—क्या आम जनता को कभी सच पता चलेगा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब निगाहें अदालत पर नहीं—
आबकारी विभाग की नीयत और हिम्मत पर टिक गई हैं।

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