
प्रयागराज। नैनी स्थित श्रमिक बस्ती समेत उत्तर प्रदेश की सभी औद्योगिक श्रमिक कॉलोनियों में रहने वाले हजारों परिवारों को उनके आवासों का मालिकाना अधिकार देने की प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। शासन के स्पष्ट निर्देश के बाद जिला स्तर पर समिति गठित कर दी गई है और कॉलोनियों का पुनः सर्वे शुरू हो चुका है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर भाजपा विधायक सुरेंद्र मैथानी ने हाल ही में महाराष्ट्र का दौरा कर वहां श्रमिक बस्तियों को मालिकाना अधिकार दिए जाने की पूरी प्रक्रिया का अध्ययन किया। बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र में जिस कानूनी और प्रशासनिक ढांचे के तहत श्रमिकों को स्वामित्व प्रदान किया गया, उसी मॉडल को उत्तर प्रदेश में लागू करने की तैयारी है।
70 वर्ष पुरानी कॉलोनी, लेकिन अब तक नहीं मिला स्वामित्व
नैनी की श्रमिक बस्ती की स्थापना लगभग सात दशक पहले श्रम विभाग द्वारा की गई थी। राजस्व अभिलेखों में यह भूमि “रिफ्यूजी कॉलोनी/लेबर कॉलोनी” के नाम से दर्ज है। जानकारी के अनुसार चक भटाही और चक इमाम अली गांव की अधिग्रहित जमीन पर यह कॉलोनी बसाई गई थी। किसानों को उस समय मुआवजा दिया गया और बाद में मजदूर परिवारों को आवास आवंटित किए गए।
हालांकि आवंटन के बाद दशकों बीत जाने के बावजूद आज तक इन परिवारों को कानूनी रूप से मालिकाना अधिकार नहीं मिल पाया। इसी मांग को लेकर पिछले कई वर्षों से स्थानीय स्तर पर आंदोलन और ज्ञापन अभियान चल रहा था।
सीडीओ की अध्यक्षता में अहम बैठक
शासन के निर्देश पर प्रयागराज में मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई। बैठक में अपर जिलाधिकारी (भू-राजस्व), उप श्रम आयुक्त, नगर आयुक्त, प्रयागराज विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग समेत कई विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।
बैठक में यह तय किया गया कि श्रमिक बस्ती, नैनी और संडवा क्षेत्र के सभी आवासों, कमरों और सार्वजनिक स्थलों का विस्तृत सर्वे कराया जाएगा। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति एक प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजेगी, जिसके बाद अंतिम नीति निर्णय लिया जाएगा।
भूमि स्वामित्व को लेकर पेचीदगी
बैठक में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि संबंधित भूमि का स्वामित्व भू-राजस्व रिकॉर्ड में जिला प्रशासन के नाम दर्ज है, श्रम विभाग के नाम नहीं। ऐसे में कानूनी रूप से स्वामित्व हस्तांतरण की प्रक्रिया कैसे पूरी की जाए, इस पर प्रशासनिक और विधिक राय ली जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भूमि पर स्वामित्व जिला प्रशासन का है, तो अंतिम निर्णय और आवंटन का अधिकार भी जिलाधिकारी स्तर पर ही होगा। इस स्थिति में प्रस्ताव शासन को भेजकर विधिक औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।
42वीं वाहिनी पीएसी का मुद्दा भी गरमाया
बैठक में 42वीं वाहिनी पीएसी को आवंटित भवन और भूमि को लेकर भी सवाल उठे। आरोप है कि श्रम विभाग ने जिन क्वार्टरों और पार्क क्षेत्र को पीएसी को उपयोग हेतु दिया, उस भूमि पर स्वयं विभाग का नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज नहीं है।
यदि भूमि जिला प्रशासन के स्वामित्व में है, तो बिना जिलाधिकारी की औपचारिक स्वीकृति के किसी अन्य विभाग को आवंटन की वैधता पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। यह मुद्दा समिति की रिपोर्ट में प्रमुखता से शामिल किया जाएगा।
सार्वजनिक स्थलों पर कब्जे का आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि श्रमिक बस्ती में स्थापित राजकीय श्रम हितकारी सामुदायिक केंद्र, सार्वजनिक अस्पताल, पुस्तकालय, बच्चों के पार्क और स्कूल मैदान जैसे सार्वजनिक स्थलों पर भी अतिक्रमण हुआ है।
प्रस्ताव है कि सार्वजनिक पार्कों और मैदानों को नगर निगम को सौंपा जाए, ताकि उनका संरक्षण और रखरखाव सुनिश्चित हो सके। बच्चों के खेल मैदान को खाली कराने की मांग भी जोर पकड़ रही है।
सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
श्रमिक बस्ती के निवासियों द्वारा यह मामला माननीय Supreme Court of India तक पहुंचाया गया था। इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज किया गया। न्यायालय की सक्रियता के बाद शासन स्तर पर भी तेजी आई।
सूत्रों का कहना है कि तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह मामला पुनः सुनवाई में आ सकता है। ऐसे में शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर इस विषय को गंभीरता से लिया जा रहा है।
मार्च-अप्रैल तक रिपोर्ट, मई-जून में फैसला संभव
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मार्च या अप्रैल तक सर्वे रिपोर्ट शासन को भेजी जा सकती है। यदि विधिक और प्रशासनिक प्रक्रिया समय पर पूरी हुई, तो मई या जून तक श्रमिक बस्तियों के निवासियों को मालिकाना अधिकार देने संबंधी बड़ा निर्णय सामने आ सकता है।
विधानसभा चुनाव से पहले इस निर्णय को राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निवासियों से अपील
प्रशासन ने श्रमिक बस्ती के सभी निवासियों से अपील की है कि वे सर्वे के दौरान अपने आवास से संबंधित दस्तावेज, आवंटन पत्र और वर्तमान स्थिति का विवरण समिति को उपलब्ध कराएं तथा उसकी प्राप्ति रसीद सुरक्षित रखें।
साथ ही यह भी कहा गया है कि सभी लोग संगठित और जागरूक रहें, ताकि किसी प्रकार की रिकॉर्ड हेराफेरी या अवैध कब्जे की आशंका न रहे।
निष्कर्ष
करीब 70 वर्ष से बसे इन परिवारों के लिए मालिकाना अधिकार केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का प्रश्न बन चुका है। अब निगाहें जिला प्रशासन और शासन के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। यदि सब कुछ तय समयसीमा में पूरा हुआ, तो नैनी की श्रमिक बस्ती प्रदेश में एक बड़े मॉडल के रूप में उभर सकती है।




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