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आबकारी विभाग के शीर्ष अधिकारियों पर आय से अधिक संपत्ति और टपरी डिस्टिलरी प्रकरण को लेकर शिकायत, मामला प्रधानमंत्री कार्यालय में लंबित:

आबकारी विभाग के शीर्ष अधिकारियों पर आय से अधिक संपत्ति और टपरी डिस्टिलरी प्रकरण को लेकर शिकायत, मामला प्रधानमंत्री कार्यालय में लंबित
लखनऊ//सहारनपुर/प्रयागराज। उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग के शीर्ष स्तर के तीन अधिकारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति और कोरोना काल के दौरान कथित अवैध शराब के परिवहन, भंडारण और बिक्री के गंभीर आरोपों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को विस्तृत शिकायत भेजी गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह मामला वर्तमान में प्रधानमंत्री कार्यालय स्तर पर लंबित है और आगे की कार्रवाई की प्रतीक्षा की जा रही है।
किन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत?
शिकायत में जिन अधिकारियों के नाम शामिल बताए गए हैं—
प्रमुख सचिव, आबकारी विभाग बीना कुमारी मीणा
आबकारी आयुक्त डॉ आदर्श सिंह व एडिशनल कमिश्नर नवनीत सेहरा प्रमुख हैं।

श्रमिक बस्ती नैनी प्रयागराज निवासी सामाजिक कार्यकर्ता ने अधिकारियों की कारगुज़ारी का कच्चा चिट्ठा प्रधान मंत्री कार्यालय को भेजा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन अधिकारियों द्वारा घोषित अचल संपत्तियों और संभावित वास्तविक बाजार मूल्य के बीच अंतर की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही आय के स्रोतों और संपत्तियों के अधिग्रहण की प्रक्रिया की भी जांच की मांग की गई है।
सहारनपुर की टपरी डिस्टिलरी का मामला
शिकायत में सहारनपुर स्थित टपरी डिस्टिलरी का विशेष उल्लेख किया गया है। आरोप है कि कोरोना महामारी के दौरान, जब प्रदेश भर में लॉकडाउन और परिवहन पर कड़े प्रतिबंध लागू थे, उस समय कथित रूप से करोड़ों रुपये की शराब का परिवहन, आबकारी गोदामों में भंडारण और विभिन्न जनपदों में बिक्री की गई।
शिकायत में उठाए गए प्रमुख प्रश्न:
लॉकडाउन के दौरान बड़े पैमाने पर शराब की ढुलाई कैसे संभव हुई?
क्या परिवहन पास और स्टॉक रजिस्टर की विधिवत एंट्री हुई थी?
आबकारी गोदामों से आपूर्ति का रिकॉर्ड क्या कहता है?
क्या आपदा काल को “अवसर” में बदलकर नियमों की अनदेखी की गई?
विभागीय कार्रवाई और तबादलों पर उठे सवाल
जानकारी के अनुसार, इस प्रकरण में आबकारी विभाग ने कई अधिकारियों को टर्मिनेट किया था। हालांकि शिकायत में यह भी आरोप है कि बदायूं जनपद, जहां कथित रूप से सबसे अधिक बिक्री हुई बताई जाती है, वहां के तत्कालीन जिला आबकारी अधिकारी पर कठोर कार्रवाई के बजाय उन्हें पहले लखनऊ में जिला आबकारी अधिकारी बनाया गया और बाद में प्रयागराज में आबकारी अधिकारी के रूप में तैनात कर दिया गया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि—
किन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और किन्हें महत्वपूर्ण तैनाती मिली?
कार्रवाई के मापदंड क्या थे?
क्या जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी थी?
विधानसभा में उठा मामला
इस पूरे प्रकरण को लेकर समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रश्न भी उठाया था। शिकायत में दावा किया गया है कि उस प्रश्न का विस्तृत उत्तर अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हुआ है, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।
प्रधानमंत्री कार्यालय में लंबित मामला
शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी जा चुकी है और वर्तमान में लंबित बताई जा रही है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि—
घोषित संपत्तियों का स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन कराया जाए।
आय से अधिक संपत्ति की जांच सक्षम केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए।
टपरी डिस्टिलरी से जुड़े परिवहन, भंडारण और बिक्री के पूरे रिकॉर्ड की फोरेंसिक ऑडिट कराई जाए।
विभागीय कार्रवाई और तबादलों की भी जांच हो।
आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार
अब तक संबंधित अधिकारियों या विभाग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। चूंकि मामला वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, कोरोना काल की कार्यवाही और संभावित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है, इसलिए इसकी संवेदनशीलता बढ़ गई है।
प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय स्तर पर इस शिकायत पर क्या निर्णय लिया जाता है और क्या किसी स्वतंत्र जांच की औपचारिक शुरुआत होती है।

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