अवधभूमि

हिंदी न्यूज़, हिंदी समाचार

“मार्च लूट मॉडल? एडवांस इंडेंट के नाम पर राजस्व की ‘मेकअप बुकिंग’—आबकारी विभाग के खेल पर बड़े सवाल”



वित्तीय वर्ष खत्म होने से ठीक पहले नया सिस्टम लागू—क्या सरकार आंकड़ों की ‘फिनिशिंग’ कर रही है?
लखनऊ/प्रतापगढ़:
उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग का 24 मार्च 2026 का ताजा सर्कुलर अब महज एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि राजस्व आंकड़ों की ‘इंजीनियरिंग’ का दस्तावेज बनता दिख रहा है। “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के नाम पर लागू की गई पेड इंडेंटिंग और पूल अकाउंट व्यवस्था की टाइमिंग ने पूरे खेल को संदिग्ध बना दिया है।
वित्तीय वर्ष खत्म होने में सिर्फ एक हफ्ता बचा हो और उसी वक्त थोक कारोबारियों से एडवांस में पैसा जमा कराने की व्यवस्था लागू कर दी जाए—तो सवाल उठना लाजिमी है:
 क्या यह सुधार है या फिर राजस्व बढ़ाने का शॉर्टकट?
 क्या है पूरा मामला?
सर्कुलर के मुताबिक:
सभी थोक अनुज्ञापियों को IESCMS पोर्टल पर बैंक अकाउंट रजिस्ट्रेशन करना होगा
फुटकर दुकानों की इंडेंटिंग के साथ ही ऑनलाइन एडवांस भुगतान अनिवार्य किया गया है
यह भुगतान विभाग के निर्धारित बैंक पूल अकाउंट में जाएगा
और सबसे अहम—यह व्यवस्था 24 मार्च 2026 से तत्काल प्रभाव से लागू
⚠️ सबसे बड़ा सवाल: 31 मार्च के आंकड़े क्या सच्चे होंगे?
यहां से शुरू होता है असली खेल—
➡️ शराब की असली बिक्री अप्रैल या बाद में होगी
➡️ लेकिन उसका पैसा मार्च में ही जमा करा लिया जाएगा
➡️ और उसी पैसे को 2025-26 के राजस्व में जोड़ दिया जाएगा
यानी:
“कमाई बाद में, गिनती अभी”
तकनीकी रूप से यह गलत नहीं कहा जाएगा, क्योंकि पैसा सरकारी खाते में आ चुका है।
लेकिन हकीकत में यह राजस्व नहीं, एडवांस कलेक्शन है—जो अगले साल की कमाई को इस साल में दिखा रहा है।
 इसलिए 31 मार्च को जारी आंकड़े:
कागजों में सही
लेकिन जमीनी हकीकत से कटे हुए
और कई मायनों में भ्रामक (Distorted)
 ‘पूल अकाउंट’—पारदर्शिता या कंट्रोल का हथियार?
सर्कुलर में बार-बार “पूल अकाउंट” का जिक्र है।
यह सिस्टम:
पूरे प्रदेश का पैसा एक ही खाते में समेट देता है
विभाग को रियल टाइम में भारी रकम दिखाने का मौका देता है
और ऊपर तक राजस्व की चमकदार तस्वीर पेश करता है
लेकिन सवाल है—
 क्या इससे सिर्फ मॉनिटरिंग आसान होगी, या फिर आंकड़ों को ‘मैनेज’ करना भी आसान हो जाएगा?
 मार्च एंड गेम: टारगेट पूरा या आंकड़ों की बाजीगरी?
हर साल मार्च में विभागों पर टारगेट पूरा करने का दबाव रहता है।
इस बार तरीका थोड़ा “स्मार्ट” दिख रहा है:
एडवांस इंडेंट = तुरंत कैश इनफ्लो
पूल अकाउंट = एक जगह बड़ी रकम का प्रदर्शन
ऑनलाइन सिस्टम = प्रक्रिया को वैधता का कवच
 नतीजा:
राजस्व अचानक बढ़ा हुआ दिखेगा, भले ही असली बिक्री न हुई हो
茶 व्यापारियों पर असर—‘पहले पैसा, बाद में माल’
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ पड़ेगा:
थोक अनुज्ञापियों पर
फुटकर दुकानदारों पर
उन्हें:
बिना बिक्री के पहले पैसा जमा करना होगा
कैश फ्लो मैनेजमेंट बिगड़ेगा
और जोखिम पूरी तरह व्यापारियों के सिर पर रहेगा
 यानी, सरकार का टारगेट पूरा करने के लिए
व्यापारियों को “फाइनेंसर” बना दिया गया है
 बड़ा सवाल: सुधार या ‘राजस्व की सजावट’?
अगर यह व्यवस्था 1 अप्रैल से लागू होती, तो इसे सुधार माना जा सकता था।
लेकिन 24 मार्च को लागू करने का मतलब साफ संकेत देता है:
“नजर 31 मार्च के आंकड़ों पर है, न कि सिस्टम सुधार पर”
易 निष्कर्ष:
आबकारी विभाग का यह सर्कुलर सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि
राजस्व आंकड़ों को चमकाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
 31 मार्च को जो आंकड़े सामने आएंगे, वे:
बुक्स में वैध होंगे
लेकिन वास्तविक आर्थिक गतिविधि को पूरी तरह नहीं दर्शाएंगे
❓ अब असली परीक्षा:
क्या सरकार बताएगी कि इसमें कितना हिस्सा “एडवांस कलेक्शन” है?
या फिर इसे पूरी तरह “उपलब्धि” के तौर पर पेश किया जाएगा?

About Author