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पूरे प्रदेश की सभी डिस्टलरियों का इंडेंट रोका गया! आबकारी विभाग ने थामा ‘ऑल-आउट’ दबाव का हथियारफेडरेशन का घटिया मोलासेस उठाओ या उत्पादन बंद करो—यूपी में अभूतपूर्व प्रशासनिक दमन:



उत्तर प्रदेश में मोलासेस को लेकर चल रहा विवाद अब किसी एक-दो डिस्टलरी तक सीमित नहीं रहा। सूत्रों के मुताबिक,
 प्रदेश की सभी डिस्टलरियों का मोलासेस इंडेंट रोक दिया गया है।
यह कार्रवाई—
निजी डिस्टलरियों पर भी लागू है,
सरकारी उपक्रमों पर भी,
और यहां तक कि उन डिस्टलरियों पर भी जिनकी अपनी चीनी मिलें (कैप्टिव यूनिट) हैं।
इस कदम ने साफ कर दिया है कि अब यह मामला
 नीति, गुणवत्ता या आपूर्ति का नहीं,
 बल्कि फेडरेशन के वर्षों पुराने, घटिया मोलासेस को हर हाल में खपाने की जबरन मुहिम बन चुका है।
आबकारी विभाग का असली खेल: सबको एक साथ रोक दो
सूत्र बताते हैं कि आबकारी विभाग ने इस बार
 “चुनिंदा दबाव” की जगह “सामूहिक सज़ा” का रास्ता अपनाया।
कारण साफ है—
यदि कुछ डिस्टलरियों का ही इंडेंट रोका जाता,
तो भेदभाव, पक्षपात और मनमानी तुरंत उजागर हो जाती।
इसलिए
 सभी डिस्टलरियों का इंडेंट एक साथ रोक दिया गया,
ताकि इसे “नीतिगत निर्णय” का जामा पहनाया जा सके।
यही इस पूरे खेल की सबसे खतरनाक चाल मानी जा रही है।
न कोई आदेश, न कोई नोटिफिकेशन—फिर किस अधिकार से?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि—
इस सामूहिक इंडेंट रोकने को लेकर
कोई लिखित शासनादेश,
कोई सार्वजनिक सर्कुलर,
कोई नियम संशोधन
सामने नहीं आया है।
डिस्टलरी संचालकों को केवल मौखिक रूप से यह बताया जा रहा है कि—
“ऊपर से निर्देश हैं।”
अब सवाल यह है—  कौन सा ऊपर?
 किस फाइल नंबर से?
 किस नियम के तहत?
घटिया और वर्षों पुराने मोलासेस को खपाने की आखिरी कोशिश
सूत्रों के अनुसार—
फेडरेशन की कई चीनी मिलों में
2 से 4 साल तक पुराना मोलासेस पड़ा है,
जिसकी गुणवत्ता
इथेनॉल उत्पादन मानकों पर खरी नहीं उतरती,
और जिसे खुले बाजार में कोई लेने को तैयार नहीं।
इसीलिए अब—  आबकारी विभाग की ताकत का इस्तेमाल कर
 डिस्टलरियों को मजबूर किया जा रहा है।
कमीशन का एंगल: तभी संभव है ‘ऑल स्टॉप’
जानकारों का मानना है कि—
बिना किसी बड़े “प्रोत्साहन” के
 पूरे प्रदेश की सप्लाई चेन रोक देना संभव नहीं।
इसी संदर्भ में यह आरोप सामने आ रहे हैं कि—  प्रति कुंतल 30–35 रुपये तक का अवैध खेल
फेडरेशन के सरकारी मोलासेस को खपाने के लिए चल रहा है।
यही वजह बताई जा रही है कि—
आबकारी विभाग ने गुणवत्ता, नियम और उद्योग—सबको दरकिनार कर दिया।
नुकसान किसका?
इस फैसले से—
इथेनॉल उत्पादन लगभग ठप होने की स्थिति में है,
करोड़ों रुपये का राजस्व जोखिम में है,
केंद्र सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य प्रभावित हो रहे हैं,
और निवेशकों में यह संदेश जा रहा है कि
 उत्तर प्रदेश में नीति नहीं, दबाव चलता है।
निष्कर्ष: यह नियमन नहीं, सत्ता का दुरुपयोग है
जब—
सभी डिस्टलरियों का इंडेंट रोका जाए,
बिना लिखित आदेश के,
बिना गुणवत्ता जांच के,
सिर्फ एक संस्था (फेडरेशन) को बचाने के लिए,
तो यह स्पष्ट हो जाता है कि—  आबकारी विभाग इस पूरे खेल का केंद्र बिंदु बन चुका है।
अब यह मामला केवल खबर नहीं,


जब आबकारी नियम स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि मोलसेस इंडेंट 24 घंटे के भीतर क्लियर किया जाना अनिवार्य है, तो फिर 5 से 15 दिनों तक इंडेंट लंबित रखने का आदेश किसके निर्देश पर दिया गया?
क्या यह देरी किसी तकनीकी कारण से हुई, या जानबूझकर एक तय रणनीति के तहत इंडेंट रोके गए?
– यदि तकनीकी कारण है, तो उसका लिखित रिकॉर्ड और समय-सीमा क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई?
कई डिस्टिलरी के पास 5 दिन से भी कम का मोलसेस अवशेष शेष होने की जानकारी विभाग को होने के बावजूद इंडेंट क्लियर न करना किस स्तर की प्रशासनिक लापरवाही है?
यदि मोलसेस की आपूर्ति बाधित होने से शराब उत्पादन ठप होता है, तो इससे होने वाली करोड़ों रुपये की राजस्व हानि की जिम्मेदारी किस अधिकारी/विभाग पर तय की जाएगी?
बिना लिखित अनुमति और वैधानिक आदेश के मोलसेस उठाने का दबाव बनाना, जबकि इंडेंट जानबूझकर रोके जा रहे हों—क्या यह नियमों का उल्लंघन नहीं है?
जब इंडेंट प्रक्रिया बाधित है, तो डिस्टिलरी से तय भुगतान तत्काल अदा करने का दबाव किस कानूनी प्रावधान के तहत बनाया जा रहा है?
क्या यह सही है कि कुछ चुनिंदा इकाइयों को प्राथमिकता देकर इंडेंट क्लियर किए जा रहे हैं, जबकि अन्य डिस्टिलरी को अनावश्यक रूप से प्रतीक्षा में रखा गया है?
– यदि नहीं, तो सभी इंडेंट की तिथि-वार स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
क्या मोलसेस आपूर्ति व्यवस्था को अस्थिर कर डिस्टिलरी इकाइयों पर वित्तीय दबाव बनाने की कोई सुनियोजित कोशिश की जा रही है?
– और यदि हां, तो इसका उद्देश्य क्या है?
विभाग यह स्पष्ट क्यों नहीं करता कि इंडेंट क्लियर न होने की स्थिति में उत्पादन बाधित होने से होने वाली क्षति का भार उद्योग पर डाला जाएगा या शासन स्वयं उसकी जिम्मेदारी लेगा?
क्या इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता नहीं है, ताकि भविष्य में प्रदेश के आबकारी राजस्व को इस प्रकार के जोखिम में न डाला जाए?

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