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आबकारी पॉलिसी पर सस्पेंस: देरी क्यों? किसे फायदा, किसे नुकसान—बड़े खेल की बू!
लखनऊ।
प्रदेश की नई आबकारी नीति अब तक सामने क्यों नहीं आई—इस सवाल ने आबकारी महकमे से लेकर शराब कारोबारियों तक बेचैनी बढ़ा दी है। नीति में हो रही देरी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं और अब जो जानकारियां छन-छनकर बाहर आ रही हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इस बार आबकारी राजस्व लक्ष्य पूरा होना मुश्किल नजर आ रहा है। ऐसे में विभाग पर “कागजी राजस्व” दिखाने का दबाव है। यही वजह बताई जा रही है कि आने वाली पॉलिसी में ऐसे नियम ठूंसे जाने की तैयारी है, जिनकी गाज सीधे फुटकर लाइसेंसियों पर गिर सकती है।
एकमुश्त लाइसेंस फीस: राजस्व बढ़ाने का फार्मूला या लाइसेंसियों को बाहर करने की साजिश?
चर्चा है कि अब फुटकर लाइसेंसियों से नवीनीकरण शुल्क एक बार में, पूरी रकम जमा कराने की तैयारी है। तर्क दिया जा रहा है कि इससे इसी वित्तीय वर्ष में भारी राजस्व दिखाया जा सकेगा।
लेकिन सवाल उठ रहे हैं—
क्या यह कदम छोटे-मझोले व्यापारियों की कमर तोड़ने के लिए है?
क्या एकमुश्त फीस के दबाव में हजारों पुराने लाइसेंसी मैदान से बाहर हो जाएंगे?
और क्या इसके बाद बड़े शराब माफिया के लिए रास्ता साफ किया जाएगा?
कारोबारियों का कहना है कि यह नीति नहीं, बल्कि छंटनी का औजार साबित हो सकती है।
देसी शराब पर एडवांस इंडेंट: हजारों करोड़ का ‘अकाउंटिंग गेम’?
एक और प्रस्ताव पर जमकर चर्चा है। बताया जा रहा है कि देसी शराब के फुटकर लाइसेंसियों को अब एडवांस इंडेंट लगाना अनिवार्य किया जा सकता है।
गणित सीधा है—
अगर हजारों देसी दुकानें एडवांस इंडेंट डालती हैं
तो एडवांस अकाउंट में हजारों करोड़ रुपये एक झटके में दिखाए जा सकते हैं
और वही रकम इस साल का राजस्व बनकर पेश की जा सकती है
सवाल यह है कि क्या यह वास्तविक बिक्री का राजस्व होगा या सिर्फ किताबों का खेल?
36 डिग्री देसी शराब सिर्फ मिलेट्स से? मोलासेस डिस्टलरी का भविष्य क्या?
सबसे बड़ा और विवादित मुद्दा यह है कि आने वाली नीति में 36 डिग्री वाली देसी शराब को केवल मिलेट्स से बनाने का प्रावधान लाया जा सकता है।
इससे कई सवाल खड़े हो गए हैं—
मोलासेस आधारित डिस्टलरियों का क्या होगा?
जो उपभोक्ता वर्षों से मोलासेस बेस शराब पीते आ रहे हैं, क्या उन्हें जबरन मिलेट्स की शराब पर शिफ्ट किया जाएगा?
क्या विभाग मोलासेस पर अपना नियंत्रण खत्म करना चाहता है, या फिर
मिलेट्स बेस्ड डिस्टलरियों का सेल्स एजेंट बनकर कुछ अफसर अपनी तिजोरियां भरना चाहते हैं?
यह सवाल अब गलियारों में खुलेआम गूंजने लगे हैं।
कोटा 10% बढ़ेगा, फीस एकमुश्त—क्या आम व्यापारी को बाहर करने की रणनीति?
सूत्रों का दावा है कि—
कोटा 10% तक बढ़ाने
लाइसेंस फीस एकमुश्त जमा कराने
और देसी दुकानों पर एडवांस इंडेंट थोपने
जैसे नियम लाकर आम व्यापारी को इस व्यवसाय से बाहर धकेलने की पूरी तैयारी है।
आरोप यहां तक हैं कि इससे किसी खास वर्ग या माफिया के लिए मैदान साफ किया जा रहा है।
नीति अटकी क्यों? मंत्री की मंजूरी नहीं?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि चर्चा यह भी है कि इन तथाकथित प्रस्तावों को मंत्री जी की मंजूरी नहीं मिल पा रही, इसी कारण नीति अब तक जारी नहीं हो सकी है।
अगर यह सही है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है—
क्या नीति विभाग चला रहा है या लॉबी?
क्या राजस्व के नाम पर व्यापारियों की बलि दी जा रही है?
और क्या आबकारी नीति अब जनहित नहीं, बल्कि हितों के टकराव का दस्तावेज बनती जा रही है?
नज़र अब सरकार पर
फिलहाल आबकारी नीति पर सस्पेंस बरकरार है, लेकिन इतना तय है कि जब नीति आएगी, तो वह सिर्फ राजस्व नहीं, बल्कि नीयत भी उजागर करेगी।
सरकार को तय करना होगा— राजस्व बढ़ाना है या व्यवस्था बिगाड़ना?
व्यापार बचाना है या माफिया पालना?
आबकारी नीति का इंतजार अब सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों व्यापारियों के भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुका है।
भांग की व्यवस्थापन रद्द करने का प्रस्ताव अटका, मुख्यमंत्री कार्यालय से नहीं मिली मंजूरी
राज्य में भांग की व्यवस्थापन व्यवस्था को रद्द करने संबंधी प्रस्ताव को मुख्यमंत्री कार्यालय से मंजूरी नहीं मिल सकी है। आबकारी विभाग की ओर से भेजे गए इस प्रस्ताव पर शीर्ष स्तर पर सहमति न बनने के कारण फिलहाल मौजूदा व्यवस्था ही जारी रहेगी।
सूत्रों के मुताबिक प्रस्ताव में भांग की बिक्री और प्रबंधन से जुड़े मौजूदा ढांचे को समाप्त करने अथवा उसमें बड़े बदलाव की बात थी, लेकिन राजस्व, कानून-व्यवस्था और सामाजिक प्रभावों को लेकर उठे सवालों के चलते मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस पर हरी झंडी नहीं दी।
अब विभाग को या तो संशोधित प्रस्ताव भेजना होगा या फिर वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करना पड़ेगा। इस फैसले से संबंधित जिलों के ठेकेदारों और लाइसेंसधारकों को फिलहाल राहत मिली है, जबकि नीति में बदलाव की अटकलों पर अस्थायी विराम लग गया है।




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