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मेरठ जोन के कई डीईओ को ओवर रेटिंग के मामले में कड़ी फटकार लेकिन मंत्री द्वारा ओवर रेटिंग प्रकरण में निलंबित गौतम बुद्ध नगर का डीईओ   पद पर बरकरार: प्रमुख सचिव के दोहरी रवैया पर उठे गंभीर सवाल:



उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग में ओवररेटिंग को लेकर मचा घमासान अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। यह मामला अब कानूनी वैधता, विभागीय अधिकार और चयनात्मक संरक्षण के गंभीर आरोपों तक पहुंच गया है।
ताज़ा समीक्षा बैठकों और विभागीय घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि ओवररेटिंग पर कार्रवाई एक समान नहीं है, बल्कि जिलों और अधिकारियों के हिसाब से बदल रही है।
तीन जिलों पर सख्ती, नोएडा पर चुप्पी
ताज़ा समीक्षा बैठक में—
जिला आबकारी अधिकारी मेरठ
जिला आबकारी अधिकारी शाहजहांपुर
जिला आबकारी अधिकारी मुरादाबाद
को ओवररेटिंग के मामलों में कड़ी फटकार लगाई गई।
अधिकारियों को चेतावनी दी गई कि यदि ओवररेटिंग की शिकायतें दोबारा मिलीं तो कठोर कार्रवाई तय है।
लेकिन इसी विभाग में एक ऐसा जिला भी है जहां नियम और आदेश दोनों बेअसर नजर आए—
नोएडा का विरोधाभास
नोएडा के जिला आबकारी अधिकारी को
ओवररेटिंग के मामले में मंत्री द्वारा निलंबित किया जा चुका है
इसके बावजूद वह अब तक अपने पद पर बरकरार हैं
यह स्थिति न केवल विभागीय अनुशासन पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि
मंत्री का आदेश भी कुछ अधिकारियों पर लागू नहीं हो रहा।
सबसे ज्यादा ओवररेटिंग बिजनौर में, कार्रवाई शून्य
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक—
मेरठ जोन में सबसे अधिक ओवररेटिंग बिजनौर जनपद में पाई गई
इसके बावजूद बिजनौर में
न तो कड़ी फटकार
न ठोस जांच
न कोई बड़ी कार्रवाई
यह चयनात्मक सख्ती अब खुले तौर पर चर्चा का विषय बन चुकी है।
जांच गन्ना विभाग से क्यों? नियम क्या कहता है
ओवररेटिंग पूरी तरह से—
उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम, 1910
उत्तर प्रदेश आबकारी नियमावली
के अंतर्गत आने वाला विषय है।
नियमों के अनुसार जांच का अधिकार
ओवररेटिंग की जांच केवल—
आबकारी विभाग
मंडलीय अधिकारी
विशेष जांच दल (SIT)
विजिलेंस
या शासन/मंत्री के आदेश से गठित समिति
को ही है।
❗ किसी अन्य विभाग से जांच कराने के लिए स्पष्ट शासनादेश और मंत्री की लिखित स्वीकृति अनिवार्य है।
गन्ना विभाग का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं
गन्ना विभाग का दायरा—
गन्ना मूल्य
चीनी मिल
किसानों से जुड़ी योजनाएं
तक सीमित है।
शराब बिक्री, लाइसेंस, एमआरपी या ओवररेटिंग से गन्ना विभाग का कोई वैधानिक संबंध नहीं है।
यही कारण है कि
डिप्टी कमिश्नर गन्ना से ओवररेटिंग की जांच कराना नियमों के विपरीत माना जा रहा है।
एडिशनल कमिश्नर के बयान से बढ़ा विवाद
समीक्षा बैठक में उस समय हड़कंप मच गया जब
एडिशनल कमिश्नर आबकारी ने कहा कि—
“मेरठ, मुरादाबाद और शाहजहांपुर में ओवररेटिंग की जांच डिप्टी कमिश्नर गन्ना से कराई गई थी।”
इस बयान ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए—
यह जांच किस आदेश पर कराई गई?
क्या मंत्री को इसकी जानकारी थी?
जांच रिपोर्ट कहां है और सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
जब प्रमुख सचिव स्वयं हैं, तो बाहरी विभाग क्यों
सबसे अहम सवाल यही है कि—
जब आबकारी विभाग की प्रमुख सचिव स्वयं गन्ना विभाग की भी प्रमुख सचिव तो जांच अपने अधीन विभागों से क्यो?
विभाग में पूरा जांच तंत्र मौजूद है
तो फिर नियमों को दरकिनार कर
गन्ना विभाग को जांच में शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी?
इसी वजह से यह आशंका तेज हो गई है कि
यह जांच कम और दबाव/ब्लैकमेलिंग का तरीका ज्यादा हो सकती है।
सबसे शर्मनाक स्थिति
पूरे घटनाक्रम में सबसे असहज और चौंकाने वाला दृश्य तब सामने आया जब—
ओवररेटिंग के मामले में मंत्री द्वारा निलंबित डीईओ नोएडा
खुद ओवररेटिंग पकड़ने का तरीका अधिकारियों को समझाते नजर आए
इससे पूरी जांच प्रक्रिया की नैतिकता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए।
चयनात्मक कार्रवाई की तस्वीर
मेरठ, शाहजहांपुर, मुरादाबाद → फटकार
बिजनौर → चुप्पी
नोएडा → मंत्री के आदेश के बावजूद संरक्षण
यह साफ संकेत देता है कि
कार्रवाई नियम से नहीं, चयन से तय हो रही है।
अब सीधे सवाल सरकार से
गन्ना विभाग को ओवररेटिंग जांच सौंपने का कानूनी आधार क्या है?
क्या इस पर मंत्री की लिखित मंजूरी है?
जिन जिलों में जांच कराई गई, उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
मंत्री के आदेश के बावजूद नोएडा डीईओ पद पर क्यों बने हुए हैं?
क्या ओवररेटिंग पर कार्रवाई सभी जिलों में समान रूप से होगी?
निष्कर्ष
ओवररेटिंग पर सख्ती जरूरी है,
लेकिन—
नियम तोड़कर की गई जांच
और चयनात्मक कार्रवाई
न तो सुधार लाएगी, न न्याय।
अब सरकार को तय करना होगा कि
आबकारी विभाग कानून से चलेगा या संरक्षण से।

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