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सिपाही की जान पर बनी बात, फिर भी कार्रवाई शून्य: भदोही डीईओ पर गंभीर आरोप, आयुक्त की भूमिका संदिग्ध:



जनपद भदोही के आबकारी विभाग से एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यशैली और शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। औराई सर्किल–3 में तैनात आबकारी सिपाही संजय तिवारी ने आरोप लगाया है कि जिला आबकारी अधिकारी अरुण कुमार शुक्ला की लगातार डांट-फटकार, मानसिक दबाव और कथित उत्पीड़न के चलते वह ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार श्री अरुण कुमार शुक्ला ने 7 जुलाई 2023 को जिला आबकारी अधिकारी, भदोही के पद पर कार्यभार ग्रहण किया था। आरोप है कि इसके बाद से विभाग में अधीनस्थ कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव और अपमानजनक व्यवहार का माहौल बन गया। इसी क्रम में सिपाही संजय तिवारी की तबीयत अचानक गंभीर रूप से बिगड़ी और चिकित्सकों द्वारा ब्रेन हेमरेज की पुष्टि की गई।
आयुक्त को भेजी गई शिकायत, फिर भी चुप्पी
पीड़ित सिपाही द्वारा पूरे प्रकरण की लिखित शिकायत आबकारी आयुक्त को भेजी गई, जिसमें स्पष्ट रूप से डीईओ अरुण कुमार शुक्ला पर मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। हैरानी की बात यह है कि इतनी गंभीर शिकायत के बावजूद अब तक न तो किसी विभागीय जांच के आदेश हुए और न ही पीड़ित कर्मचारी को कोई प्रशासनिक राहत दी गई।
मानवीय संवेदनाओं पर भारी सिस्टम
एक सिपाही का ब्रेन हेमरेज जैसी जानलेवा स्थिति में पहुंच जाना महज व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर उत्पीड़न और प्रशासनिक असंवेदनशीलता का संकेत है। सवाल यह उठता है कि यदि शिकायत निराधार है तो निष्पक्ष जांच से परहेज क्यों? और यदि आरोप सही हैं तो कार्रवाई से बचने की कोशिश क्यों की जा रही है?
आयुक्त की भूमिका पर उठे सवाल
मामले में आबकारी आयुक्त की निष्क्रियता अब संदेह के घेरे में है। जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते मामले का संज्ञान लेकर जांच बैठाई जाती, तो न केवल सच्चाई सामने आती बल्कि विभाग की छवि भी बचाई जा सकती थी। वर्तमान स्थिति में यह चुप्पी कई तरह की आशंकाओं को जन्म दे रही है।
क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार?
सूत्रों का कहना है कि मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई, तो यह प्रकरण मानवाधिकार उल्लंघन, सेवा नियमों की अवहेलना और प्रशासनिक लापरवाही की श्रेणी में आ सकता है।
अब कार्रवाई की मांग तेज
इस पूरे मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि
क्या आबकारी विभाग में अधीनस्थ कर्मचारी सुरक्षित हैं?
और
क्या एक सिपाही की जान पर बनी स्थिति भी विभाग को जगाने के लिए काफी नहीं है?
अब निगाहें आबकारी आयुक्त पर टिकी हैं कि वे इस गंभीर प्रकरण में निष्पक्ष जांच के आदेश देकर दोषियों पर कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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