
प्रदेश में आबकारी विभाग की दुकानों के नवीनीकरण की प्रक्रिया इस बार कई सवाल खड़े कर रही है। निर्धारित अंतिम तिथि बीत जाने के बावजूद पूरे प्रदेश में केवल करीब 86 प्रतिशत दुकानों का ही रिन्यूवल हो सका है। शेष दुकानों की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। विभागीय हलकों में इसे प्रशासनिक चूक, नीतिगत अस्पष्टता और जमीनी समन्वय की कमी से जोड़कर देखा जा रहा है।
मॉडल शॉप की दुर्दशा: जिम्मेदारी किसकी?
सबसे अधिक चिंता मॉडल शॉप्स को लेकर है, जहां रिन्यूवल का प्रतिशत मात्र लगभग 65% तक सिमट गया है। सूत्रों का कहना है कि मॉडल शॉप की मौजूदा स्थिति के लिए कई स्तरों पर जवाबदेही बनती है:
नीति निर्माण स्तर पर देरी – कंपोजिट और मॉडल शॉप की श्रेणी, लाइसेंस शुल्क और संचालन शर्तों को लेकर समय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए।
जिला प्रशासन की सुस्ती – कई जिलों में नोटिस, सत्यापन और दस्तावेज़ी प्रक्रिया अंतिम दिनों तक लंबित रही।
ऑनलाइन प्रणाली की बाधाएं – अंतिम तिथि के आसपास पोर्टल संबंधी तकनीकी समस्याओं की शिकायतें भी सामने आईं।
लाइसेंसधारकों की अनिच्छा – बढ़ी हुई फीस या कड़ी शर्तों के कारण कुछ संचालकों ने रिन्यूवल में रुचि नहीं दिखाई।
इन परिस्थितियों ने मिलकर मॉडल शॉप की स्थिति को और बिगाड़ दिया। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विभागीय नेतृत्व ने समय रहते निगरानी और समीक्षा की?
जिलेवार तस्वीर: कहीं तेजी, कहीं सुस्ती
रिन्यूवल के आंकड़ों में जिलों के बीच बड़ा अंतर सामने आया है—
बलिया में सर्वाधिक प्रतिशत में दुकानों का रिन्यूवल दर्ज किया गया है। यहां प्रशासनिक सक्रियता और समयबद्ध प्रक्रिया की चर्चा हो रही है।
इसके विपरीत झांसी में फुटकर अनुज्ञापन का रिन्यूवल मात्र करीब 70 प्रतिशत ही हो पाया, जो प्रदेश में सबसे कम माना जा रहा है।
झांसी में कम रिन्यूवल के पीछे कारणों को लेकर आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रक्रियागत देरी और शर्तों को लेकर असमंजस की चर्चा है।
अंतिम तिथि बढ़ी, फिर भी नहीं पूरा हुआ काम
सूत्रों के अनुसार विभाग ने अंतिम तिथि को एक दिन बढ़ाकर 24 फरवरी तक कर दिया था। इसके बावजूद रिन्यूवल की प्रक्रिया अधूरी रह गई। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल समय की नहीं, बल्कि तैयारी और प्रबंधन की भी है।
राजस्व पर असर और आगे की स्थिति
आबकारी विभाग राज्य के राजस्व का बड़ा स्रोत माना जाता है। यदि शेष दुकानों का रिन्यूवल शीघ्र नहीं हुआ, तो सरकार को संभावित राजस्व हानि का सामना करना पड़ सकता है।
अब नजर इस बात पर है कि विभागीय स्तर पर क्या समीक्षा होती है, क्या जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब किया जाएगा, और क्या मॉडल शॉप व कंपोजिट दुकानों की नीति में संशोधन किया जाएगा।
अगर आप चाहें तो मैं इस खबर में संभावित राजस्व अनुमान, संबंधित शासनादेश, और जवाबदेही तय करने की मांग को जोड़ते हुए इसे और अधिक खोजी और प्रभावशाली बना सकता हूँ।
प्रदेश में आबकारी विभाग की दुकानों के नवीनीकरण की प्रक्रिया इस बार कई सवाल खड़े कर रही है। निर्धारित अंतिम तिथि बीत जाने के बावजूद पूरे प्रदेश में केवल करीब 86 प्रतिशत दुकानों का ही रिन्यूवल हो सका है। शेष दुकानों की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। विभागीय हलकों में इसे प्रशासनिक चूक, नीतिगत अस्पष्टता और जमीनी समन्वय की कमी से जोड़कर देखा जा रहा है।
मॉडल शॉप की दुर्दशा: जिम्मेदारी किसकी?
सबसे अधिक चिंता मॉडल शॉप्स को लेकर है, जहां रिन्यूवल का प्रतिशत मात्र लगभग 65% तक सिमट गया है। सूत्रों का कहना है कि मॉडल शॉप की मौजूदा स्थिति के लिए कई स्तरों पर जवाबदेही बनती है:
नीति निर्माण स्तर पर देरी – कंपोजिट और मॉडल शॉप की श्रेणी, लाइसेंस शुल्क और संचालन शर्तों को लेकर समय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए।
जिला प्रशासन की सुस्ती – कई जिलों में नोटिस, सत्यापन और दस्तावेज़ी प्रक्रिया अंतिम दिनों तक लंबित रही।
ऑनलाइन प्रणाली की बाधाएं – अंतिम तिथि के आसपास पोर्टल संबंधी तकनीकी समस्याओं की शिकायतें भी सामने आईं।
लाइसेंसधारकों की अनिच्छा – बढ़ी हुई फीस या कड़ी शर्तों के कारण कुछ संचालकों ने रिन्यूवल में रुचि नहीं दिखाई।
इन परिस्थितियों ने मिलकर मॉडल शॉप की स्थिति को और बिगाड़ दिया। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विभागीय नेतृत्व ने समय रहते निगरानी और समीक्षा की?
जिलेवार तस्वीर: कहीं तेजी, कहीं सुस्ती
रिन्यूवल के आंकड़ों में जिलों के बीच बड़ा अंतर सामने आया है—
बलिया में सर्वाधिक प्रतिशत में दुकानों का रिन्यूवल दर्ज किया गया है। यहां प्रशासनिक सक्रियता और समयबद्ध प्रक्रिया की चर्चा हो रही है।
इसके विपरीत झांसी में फुटकर अनुज्ञापन का रिन्यूवल मात्र करीब 70 प्रतिशत ही हो पाया, जो प्रदेश में सबसे कम माना जा रहा है।
झांसी में कम रिन्यूवल के पीछे कारणों को लेकर आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रक्रियागत देरी और शर्तों को लेकर असमंजस की चर्चा है।
अंतिम तिथि बढ़ी, फिर भी नहीं पूरा हुआ काम
सूत्रों के अनुसार विभाग ने अंतिम तिथि को एक दिन बढ़ाकर 24 फरवरी तक कर दिया था। इसके बावजूद रिन्यूवल की प्रक्रिया अधूरी रह गई। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल समय की नहीं, बल्कि तैयारी और प्रबंधन की भी है।
राजस्व पर असर और आगे की स्थिति
आबकारी विभाग राज्य के राजस्व का बड़ा स्रोत माना जाता है। यदि शेष दुकानों का रिन्यूवल शीघ्र नहीं हुआ, तो सरकार को संभावित राजस्व हानि का सामना करना पड़ सकता है।
अब नजर इस बात पर है कि विभागीय स्तर पर क्या समीक्षा होती है, क्या जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब किया जाएगा, और क्या मॉडल शॉप व कंपोजिट दुकानों की नीति में संशोधन किया जाएगा।




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