
आबकारी विभाग में आज हुए 20 सहायक आबकारी आयुक्तों के तबादलों ने पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग का दावा है कि जिन अधिकारियों ने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया था, उनका स्थानांतरण नियमानुसार किया गया है, लेकिन इसी सूची में एक ऐसा नाम शामिल है जिसने पूरी ट्रांसफर प्रक्रिया को कटघरे में ला खड़ा किया है। कार्मिक मुख्यालय में तैनात सहायक आबकारी आयुक्त डॉ. निरंकार नाथ पांडे को अभी डेढ़ वर्ष भी पूरे नहीं हुए और उन्हें तय अवधि से पहले ही हटा दिया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि समय से पहले हटाने का कोई कारण, कोई प्रशासनिक आवश्यकता और कोई स्पष्टीकरण न तो ट्रांसफर आदेश में दर्ज है और न ही विभाग की ओर से सार्वजनिक किया गया है। सवाल यह नहीं है कि ट्रांसफर क्यों हुआ, सवाल यह है कि नियम किसके लिए हैं और मनमानी किसके लिए?
सूत्रों के मुताबिक, डॉ. निरंकार नाथ पांडे की नई तैनाती त्रिवेणी डिस्टलरी, मुजफ्फरनगर में की जा रही है, जिसे विभाग के भीतर “मनचाही पोस्टिंग” माना जा रहा है। यदि यह पोस्टिंग सामान्य प्रशासनिक जरूरत के तहत है तो फिर निर्धारित कार्यकाल से पहले हटाने की जल्दबाजी क्यों? और यदि यह विशेष कृपा का परिणाम है तो जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कब होगी?
इस पूरे ट्रांसफर में यह भी साफ दिख रहा है कि तीन वर्ष पूरा करने वाले अधिकांश अधिकारियों को डिस्टलरी में भेजा गया, लेकिन नियमों की दुहाई देने वाला विभाग खुद अपने ही नियमों को ताक पर रखता नजर आ रहा है। कार्मिक मुख्यालय जैसी अहम पोस्ट से डेढ़ साल में ही हटाना सीधे-सीधे चयनात्मक कार्रवाई और पक्षपात की ओर इशारा करता है।
अब यह मामला सिर्फ एक अधिकारी के ट्रांसफर का नहीं रहा, बल्कि आबकारी विभाग में चल रही कथित अफसरशाही, सेटिंग और मनमानी का प्रतीक बन गया है। देखना यह है कि मंत्री इस गंभीर अनियमितता पर आंख मूंदते हैं या फिर नियमों की साख बचाने के लिए पूरे ट्रांसफर आदेश की समीक्षा कराते हैं। विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे इन सवालों का जवाब अब टालना आसान नहीं होगा।




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