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मंत्री के आदेश की खुली अवहेलना!प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक हफ्ते बाद भी डीईओ सुबोध कांत निलंबित नहीं:



प्रमुख सचिव–कमिश्नर की भूमिका सवालों के घेरे में**
लखनऊ/गौतमबुद्ध नगर।
आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल द्वारा एक सप्ताह पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फैसले की सार्वजनिक घोषणा के बावजूद गौतमबुद्ध नगर के जिला आबकारी अधिकारी सुबोध कांत पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह स्थिति अब मंत्री के आदेश की अवहेलना और गंभीर अनुशासनहीनता का मामला बनती जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, निलंबन से जुड़ी फाइल विभागीय स्तर पर अटकी हुई है। सवाल यह है कि जब मंत्री स्तर से निर्णय घोषित हो चुका है, तो प्रमुख सचिव और संबंधित कमिश्नर ने अब तक आदेश लागू क्यों नहीं किया?
विभागीय गलियारों में डीईओ को “कमिश्नर का लाडला” बताया जा रहा है। यही वजह मानी जा रही है कि मंत्री के आदेश के बावजूद कार्रवाई ठंडी पड़ गई है।
अब बड़ा सवाल यह है—
➡️ मंत्री के आदेश को किसने रोका?
➡️ किसके संरक्षण में डीईओ सुरक्षित है?
➡️ क्या आदेश की अवहेलना करने वालों पर भी कार्रवाई होगी?
 इनसाइड स्टोरी
**डीईओ को किसका बैकअप?
मंत्री के फैसले के बाद भी क्यों नहीं हिली फाइल
अफसरशाही बनाम राजनीतिक आदेश की जंग?**
आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद यह माना जा रहा था कि गौतमबुद्ध नगर के जिला आबकारी अधिकारी सुबोध कांत पर त्वरित कार्रवाई होगी। लेकिन एक सप्ताह बीतने के बाद भी निलंबन न होना यह साफ संकेत देता है कि मामला केवल प्रशासनिक देरी का नहीं, बल्कि अंदरूनी बैकअप सिस्टम का है।
फाइल कहां अटकी?
सूत्र बताते हैं कि मंत्री के फैसले के बाद फाइल प्रमुख सचिव स्तर तक तो पहुंची, लेकिन उसके आगे बढ़ने की रफ्तार अचानक थम गई। इसके बाद कमिश्नर स्तर से कोई ठोस संस्तुति न जाना सवाल खड़े करता है।
कमिश्नर फैक्टर
विभाग के अंदर चर्चा है कि डीईओ सुबोध कांत को कमिश्नर का भरोसेमंद अधिकारी माना जाता है। यही कारण है कि उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर लगातार “सॉफ्ट हैंडलिंग” अपनाई जा रही है।
क्या यह मौन सहमति है?
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि
“मंत्री के आदेश को बिना शीर्ष स्तर के संरक्षण के रोका नहीं जा सकता।”
इसका अर्थ साफ है—या तो आदेश को जानबूझकर हल्का किया गया, या फिर वरिष्ठ अफसरों की मौन सहमति मौजूद है।
जीरो टॉलरेंस की परीक्षा
योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के बीच यह मामला एक लिटमस टेस्ट बन चुका है। यदि मंत्री के सार्वजनिक आदेश भी अफसरशाही की दीवार से टकराकर रुक जाएं, तो यह शासन की आंतरिक कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है।
अब आगे क्या?
सूत्रों के मुताबिक, यदि आने वाले दिनों में भी कार्रवाई नहीं होती है, तो यह मामला
प्रमुख सचिव,
कमिश्नर
और आदेश के क्रियान्वयन से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तक पहुंच सकता है।

सबसे बड़ा सवाल:

गौतम बुद्ध नगर में ओवर रेटिंग जैसे गंभीर आरोपों के बाद आबकारी मंत्री के आदेश पर जिला आबकारी अधिकारी सुबोध कांत श्रीवास्तव के निलंबन की घोषणा तो की गई, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी सवालों के घेरे में है। निलंबन आदेश के बावजूद सुबोध कांत श्रीवास्तव के अब तक पद पर बने रहने और विभाग द्वारा यह स्पष्ट न कर पाने कि वर्तमान में गौतम बुद्ध नगर का जिला आबकारी अधिकारी आखिर है कौन, ने पूरे मामले को संदेहास्पद बना दिया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि मंत्री स्तर से निलंबन का आदेश जारी हो चुका है तो उस आदेश का पालन अब तक क्यों नहीं हुआ और विभागीय स्तर पर इसकी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही, जिससे शासन की जीरो टॉलरेंस नीति पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

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