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आबकारी विभाग में ‘मौखिक हुक्म’ पर जांच! अधिकार क्षेत्र पर उठे बड़े सवाल:

आबकारी विभाग में ‘मौखिक हुक्म’ पर जांच! अधिकार क्षेत्र पर उठे बड़े सवाल
लखनऊ। प्रदेश के आबकारी विभाग में इन दिनों अराजकता और अधिकारों के टकराव की चर्चा जोरों पर है। आरोप है कि प्रमुख सचिव वीणा कुमारी मीना के कथित मौखिक आदेश पर गन्ना एवं चीनी विभाग के अधिकारी–कर्मचारी आबकारी विभाग में ओवर रेटिंग और तस्करी जैसे संवेदनशील मामलों की जांच कर रहे हैं, जबकि इस संबंध में कोई लिखित आदेश जारी नहीं हुआ है।
यही नहीं, जांच के दौरान गन्ना विभाग के अधिकारियों द्वारा आबकारी विभाग के एडिशनल कमिश्नर नवनीत सेहरा से निर्देश लेने की भी चर्चा है। इससे पूरे मामले में वैधानिकता, अधिकार क्षेत्र और पारदर्शिता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
बिना लिखित आदेश के जांच कैसे?
प्रशासनिक नियमों के अनुसार किसी भी विभागीय जांच के लिए स्पष्ट लिखित आदेश, जांच का दायरा, अधिकार क्षेत्र और अधिकृत अधिकारी का उल्लेख आवश्यक होता है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि इस मामले में ऐसा कोई औपचारिक आदेश उपलब्ध नहीं है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि:
गन्ना विभाग के अधिकारी आबकारी विभाग के मामलों में किस विधिक आधार पर जांच कर रहे हैं?
जांच की रिपोर्ट किसे सौंपी जानी है और उसका वैधानिक दर्जा क्या होगा?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि बिना लिखित आदेश की जांच भविष्य में न्यायिक चुनौती का विषय बन सकती है।
एडिशनल कमिश्नर की दोहरी भूमिका पर सवाल
मामले को और उलझाने वाला पहलू यह है कि एडिशनल कमिश्नर नवनीत सेहरा की तैनाती आबकारी विभाग के साथ-साथ चीनी मिल फेडरेशन में भी बताई जा रही है।
ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि:
यदि गन्ना विभाग के अधिकारी जांच कर रहे थे, तो उन्हें निर्देश देने का अधिकार किसके पास था?
क्या आबकारी विभाग का अधिकारी दूसरे विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे सकता है?
क्या यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मामला नहीं बनता?
सूत्रों के अनुसार जांच के दौरान निर्देशों का आदान-प्रदान मौखिक रूप से हुआ, जिससे प्रक्रिया की पारदर्शिता पर और संदेह गहराता है।
‘अवैध जांच’ या ब्लैकमेलिंग का औजार?
विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी है कि बिना स्पष्ट आदेश और अधिकार के की जा रही यह जांच कहीं अवैध दबाव बनाने का माध्यम तो नहीं। कुछ लोगों का आरोप है कि इसे डिस्टिलरी संचालकों और संबंधित कारोबारियों पर दबाव बनाकर अवैध वसूली के हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि जांच की प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में हो तो निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
सरकार की चुप्पी और जवाबदेही का सवाल
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि:
क्या प्रमुख सचिव स्तर से कोई औपचारिक आदेश जारी हुआ था?
यदि नहीं, तो जांच की जवाबदेही किसकी तय होगी?
और यदि मौखिक आदेश पर कार्रवाई हुई, तो क्या यह प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन नहीं है?
विपक्षी दलों और विभागीय सूत्रों की मानें तो यह मामला उच्च स्तरीय जांच का विषय बन सकता है। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि सरकार पूरे प्रकरण पर स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक करे और यदि प्रक्रिया में अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करे।
फिलहाल आबकारी विभाग में चल रही इस ‘मौखिक जांच’ ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौखिक आदेश पर ‘मौखिक जांच’! प्रशासनिक अराजकता की पराकाष्ठा?
प्रदेश में इन दिनों एक अभूतपूर्व स्थिति देखने को मिल रही है—गन्ना एवं चीनी विभाग के अधिकारी आबकारी विभाग के अधिकारियों की जांच कर रहे हैं, वह भी कथित तौर पर केवल मौखिक आदेश के आधार पर। शासन व्यवस्था में यह स्थिति कई स्तरों पर गंभीर अराजकता की ओर संकेत करती है।
यह अराजकता क्यों मानी जा रही है?
लिखित आदेश का अभाव
किसी भी विभागीय जांच के लिए स्पष्ट लिखित आदेश, जांच का दायरा, अधिकृत अधिकारी और रिपोर्टिंग प्राधिकरण तय होना अनिवार्य है। मौखिक निर्देश पर कार्रवाई प्रशासनिक नियमावली की मूल भावना के विपरीत मानी जाती है।
अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का टकराव
गन्ना विभाग का दायित्व चीनी मिलों और गन्ना प्रबंधन तक सीमित है, जबकि ओवर रेटिंग और तस्करी जैसे विषय आबकारी विभाग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में दूसरे विभाग के अधिकारी किस विधिक आधार पर आबकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय कर सकते हैं?
जवाबदेही का संकट
यदि जांच लिखित आदेश पर नहीं है तो—
जांच रिपोर्ट किसे सौंपी जाएगी?
क्या लिखित जांच आख्या दी जाएगी या मौखिक ही निपटारा होगा?
भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में रिकॉर्ड पर क्या उपलब्ध रहेगा?
प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्न
शासन व्यवस्था में हर कार्रवाई का दस्तावेजीकरण आवश्यक होता है। मौखिक आदेश और मौखिक आख्या की परंपरा यदि स्थापित होती है, तो यह प्रशासनिक अराजकता का खतरनाक उदाहरण बन सकती है।
मेरठ, बरेली और मुरादाबाद मंडल के अधिकारी सवालों के घेरे में
सूत्रों के अनुसार गन्ना विभाग के अधिकारियों ने मेरठ मंडल, बरेली मंडल और मुरादाबाद मंडल के डिप्टी आबकारी अधिकारियों तथा संबंधित डीडीओ को गंभीर सवालों के दायरे में ला खड़ा किया है।
अब देखना यह होगा कि—
क्या इन अधिकारियों के विरुद्ध कोई औपचारिक नोटिस या कारण बताओ नोटिस जारी होता है?
क्या जांच रिपोर्ट लिखित रूप में शासन को भेजी जाएगी?
या फिर पूरी प्रक्रिया मौखिक आदेश से शुरू होकर मौखिक आख्या पर ही समाप्त हो जाएगी?
संभावित परिणाम
यदि बिना वैधानिक आधार के जांच और कार्रवाई की परंपरा शुरू होती है, तो यह न केवल विभागीय मनोबल को प्रभावित करेगी बल्कि भविष्य में न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता भी खोल सकती है। प्रशासनिक व्यवस्था में नियमों की अनदेखी से शासन की विश्वसनीयता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
फिलहाल पूरा मामला इस बात पर टिका है कि जांच प्रक्रिया को विधिसम्मत रूप दिया जाता है या नहीं। यदि पारदर्शिता और लिखित आदेश सामने नहीं आते, तो यह प्रकरण शासन में अराजकता और अधिकारों के दुरुपयोग की मिसाल के रूप में देखा जाएगा।

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