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रामपुर GST घोटाला: 10.52 करोड़ की चोरी में विभागीय लापरवाही या मिलीभगत? बड़े सवालों के बीच 4 पर चार्जशीट:



रामपुर | अवध भूमि न्यूज़
रामपुर में 10.52 करोड़ रुपये के जीएसटी घोटाले में क्राइम ब्रांच द्वारा चार आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद अब इस पूरे मामले में विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस तरह से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर फर्म का पंजीकरण हुआ और वर्षों तक करोड़ों का कारोबार चलता रहा, उसने साफ तौर पर विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
फर्जी कागजों से मिला पंजीकरण, जांच क्यों नहीं हुई?
एमएच इंटरप्राइजेज फर्म ने जिस पते पर अपना जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराया, वह वास्तविक व्यापार स्थल ही नहीं था।
फर्जी किरायानामा पोर्टल पर अपलोड किया गया
मात्र 500 रुपये किराया दिखाया गया
मौके पर जांच में यह भी सामने आया कि कोई किराया लिया ही नहीं जा रहा था
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजीकरण के समय विभागीय अधिकारियों ने दस्तावेजों का सत्यापन क्यों नहीं किया? क्या बिना भौतिक जांच के ही रजिस्ट्रेशन दे दिया गया?
53 करोड़ का कारोबार, फिर भी नहीं लगी भनक
फर्म ने 2019-20 से 2025 तक करीब 53 करोड़ रुपये का कारोबार दिखाया, लेकिन इतने बड़े लेनदेन के बावजूद विभाग को कोई संदेह नहीं हुआ।
नियमित रिटर्न दाखिल होते रहे
बोगस ITC का इस्तेमाल होता रहा
सरकार को करोड़ों का नुकसान होता रहा
यह स्थिति या तो गंभीर लापरवाही को दर्शाती है या फिर अंदरूनी मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
बोगस ITC का खेल और विभाग की चुप्पी
जांच में सामने आया कि फर्म ने किसानों से खरीद दिखाने के बजाय फर्जी फर्मों से खरीद दिखाकर ITC लिया।
यह प्रक्रिया बिना विभागीय सिस्टम की जानकारी के संभव नहीं मानी जाती।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी टैक्स चोरी लंबे समय तक चलना विभागीय निगरानी की विफलता को दर्शाता है।
अपील में भी नियमों का उल्लंघन
जब मामला खुला तो अपील के दौरान भी नियमों को दरकिनार किया गया।
10% अनिवार्य जमा ITC से दिखाया गया
जबकि नियमों के अनुसार यह नकद होना चाहिए था
यहां भी सवाल उठता है कि क्या विभागीय स्तर पर इस गड़बड़ी को नजरअंदाज किया गया?
मिलीभगत की आशंका गहराई
पूरे मामले में जिस तरह से:
फर्जी दस्तावेज स्वीकार किए गए
वर्षों तक रिटर्न पास होते रहे
करोड़ों का ITC एडजस्ट होता रहा
इन सभी तथ्यों से यह आशंका और मजबूत होती है कि बिना अंदरूनी सहयोग के इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं था।
हाई कोर्ट से राहत, लेकिन सवाल बरकरार
मामले में मुख्य आरोपियों को फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट से गिरफ्तारी पर रोक मिल गई है, लेकिन विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर अब तक कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आई है।
निष्कर्ष: जांच का दायरा बढ़ाने की जरूरत
रामपुर का यह मामला केवल चार आरोपियों तक सीमित नहीं दिखता।
जरूरत इस बात की है कि:
विभागीय अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच हो
यह पता लगाया जाए कि लापरवाही थी या सुनियोजित मिलीभगत
दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए
अवध भूमि न्यूज़ का मानना है कि जब तक विभाग के अंदर बैठे जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होगी, ऐसे घोटाले रुकना मुश्किल है।

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