
प्रयागराज/लखनऊ। प्रदेश में मोलासेस (शीरा) के कथित एक्सपोर्ट को लेकर मामला अब और ज्यादा गंभीर होता जा रहा है। सूत्रों और चर्चाओं के मुताबिक, जहां एक ओर बाजार में शीरे की कमी (क्राइसिस) बताई जा रही है और कीमत करीब 1100 रुपये प्रति कुंतल तक पहुंच चुकी है, वहीं दूसरी ओर ढाई लाख कुंतल शीरा एक्सपोर्ट की मंजूरी दिए जाने की बात सामने आ रही है।
इस विरोधाभास ने सीधे तौर पर कमिश्नर की भूमिका को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
❗ पेराई सत्र के बीच कैसे तय हुआ “अतिरिक्त शीरा”?
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि:
जब पेराई सत्र (Crushing Season) जारी है और बाजार में कमी की स्थिति बताई जा रही है,
तो आखिर किस आधार पर यह आकलन कर लिया गया कि शीरा अतिरिक्त (Surplus) है और उसे निर्यात किया जा सकता है?
जानकारों का कहना है कि आमतौर पर इस तरह का निर्णय लेने से पहले:
उत्पादन का वास्तविक आंकलन
घरेलू खपत की जरूरत
भविष्य की मांग
का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है।
ऐसे में यह निर्णय जल्दबाजी या पूर्व नियोजित होने की चर्चाएं तेज हैं।
“रुपये में खरीद, डॉलर में बिक्री”—अरबों का खेल?
सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले में बड़ा आर्थिक खेल होने की आशंका जताई जा रही है:
शीरा स्थानीय स्तर पर रुपये में खरीदा जाएगा
और फिर विदेशों में डॉलर में कई गुना महंगे दाम पर बेचा जाएगा
जानकारों के मुताबिक यह अंतर अरबों रुपये के मुनाफे में बदल सकता है, जिससे पूरे सौदे पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
六 कमिश्नर के पीए की भूमिका पर भी चर्चा
चर्चाओं में यह भी सामने आ रहा है कि:
कमिश्नर के पीए अमित अग्रवाल की इस पूरी डील में अहम भूमिका बताई जा रही है।
हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेजी से फैल रही है।
✈️ डील के बाद कमिश्नर का विदेश दौरा
सूत्रों के अनुसार:
इस मंजूरी के बाद कमिश्नर का अचानक विदेश जाना भी कई सवाल खड़े कर रहा है।
लोग यह जानना चाह रहे हैं कि:
क्या यह महज संयोग है?
या फिर इस पूरे प्रकरण से जुड़ा कोई पहलू?
विभाग से पारदर्शिता की मांग
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ी मांग उठ रही है कि:
संबंधित विभाग एग्रीमेंट और मंजूरी की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करे
जिसमें शामिल हो:
किन शर्तों पर एक्सपोर्ट की अनुमति दी गई
चयन प्रक्रिया क्या थी
किन आधारों पर अन्य कंपनियों को खारिज किया गया
अंतिम स्वीकृति किस स्तर से मिली
आखिर इसमें छुपाने जैसी क्या बात है?
“जब तक सच सामने नहीं, तब तक सवाल जारी”
फिलहाल यह पूरा मामला सूत्रों और चर्चाओं पर आधारित है, लेकिन जिस तरह के आरोप और तथ्य सामने आ रहे हैं, उसने इसे बेहद संवेदनशील बना दिया है।
साफ है कि जब तक विभाग खुद सामने आकर विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं देता, तब तक संदेह, सवाल और चर्चाओं का दौर थमने वाला नहीं है।
निष्कर्ष
शीरे की कमी, ऊंची कीमत, पेराई सत्र के बीच एक्सपोर्ट मंजूरी और फिर अरबों के संभावित मुनाफे की चर्चा—
यह पूरा मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक और नीतिगत सवालों का केंद्र बन गया है।
अब नजर इस बात पर है कि सरकार और विभाग इस पर क्या रुख अपनाते हैं—सफाई या कार्रवाई?




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